Wednesday, December 4, 2019

कमाण्डो-3 से जुडे लोग समाज के माथे पर कलंक-नवीन मोर


रविन्द्र शामली - क्या आप फिल्मे देखते है ?
नवीन मोर - नही 

रविन्द्र शामली - फिल्म कमाण्डो 3 मे जो दिखाया गया उसे  क्या कहोगे ?
नवीन मोर - यह पहलवानो को बदनाम करने की शाजिश है। दुर्भाग्यपूर्ण है। 

रविन्द्र शामली - पहलवानो के पास  पैसा और पावर दोनो है। चहाते तो सिनेमा घरो की ईट से ईठ बजा देते   लेकिन एसा नही किया , क्या कहोगे ?
नवीन मोर - पहलवान बहुत सभ्य और समझदार होते है। इसलिये जो भी करते है कानून के दायरे मे रहकर करते है। 

रविन्द्र शामली - सैन्सर बोर्ड को कितना दोषी मानते है ?
नवीन मोर - बराबर का दोषी है। सैन्सर बोर्ड को पहले ही एसे सीन काटने चाहिये थे। 

रविन्द्र शामली - एक तरफ पहलवान देश का नाम रोशन कर रहे है। दूसरी तरफ फिल्म के द्वारा पहलवानो को बदनाम किया जा रहा है। क्यो , क्या कहोगे ?
नवीन मोर - शायद ये इस फिल्म से जुडे लोगो की छोटी सोच का परिणाम है। जिन्हे पहलवानी का मतलब ही नही पता है।  

रविन्द्र शामली - कानूनी लडाई के लिये कोई क्यो सामने नही आ रहा है ?
नवीन मोर - नही चारो ओर विरोध फिल्म का हो रहा है। पहलवान विरोध कर रहे है। हमारे गुरू हनुमान अखाडे के द्रोणाचार्य महासिंहराव सामने आये हैं। उम्मीद है जो भी होगा अच्छा ही होगा । 

रविन्द्र शामली - फिल्म की स्टार कास्ट को किस नजर से देखते है। 
नवीन मोर - कागजी हीरो  कागजी लोग है ये क्या जाने इज्जत कैसे कमाई जाती है। 

रविन्द्र शामली - असली बिमारी की जड क्या है ? 
नवीन मोर - पैसा   


रविन्द्र शामली- आप भी पहलवान है। पहलवान वास्तव मे कैसे होते है ? 
नवीन मोर - देखिये पहलवान शर्मीले होते है। दूसरे की बहन बेटी को अपनी बहन बेटी मानते है। मान सम्मान करते है। ऑख उठाकर तक किसी को नही देखते । बडो के बताये रास्ते पर चलते है। तब जाकर कही देश का नाम रोशन करते है। मुझे गर्व है कि मै पहलवान हू । देश के लिये खेला हू । 

रविन्द्र शामली -पाठको को क्या संदेश दोगे ?
नवीन मोर - इस फिल्म के साथ साथ इस एक्टर और निर्माता  की दूसरी फिल्म को ना देखे इन लोगो की ऑखे खोलने का सही उपाय है। 

साक्षातकार कर्ता 
रविन्द्र शामली 

Wednesday, October 23, 2019

पहलवान संन्दीप पोसवाल पर विशेष


सन्दीप पोसवाल पहलवान का जन्म 15-07-1995 को उत्तर प्रदेश के हस्तिनापुर के निकट गॉव रानी नंगला मे हुआ था । सन्दीप पहलवान ने बचपन मे यह नही नही सोचा था  कि पहलवान बनुगॉ सन्दीप पोसवाल के शुरूवाती दौर की बात करे तो सन्दीप बचपन से ही शर्मीले स्वभाव के थे । साथ के बच्चो के साथ मे सन्दीप भी रोजाना सुबह को दौड लगाने जाया करता था । एक दिन का जिकर है। सन्दीप जहॉ पर दौड लगाने जाया करता था वही पर एक खेत की जुताई हो रही थी । खेत मे ही लडकपन्न मे सन्दीप पोसवाल अपने साथी दोस्त के साथ कुस्ती लडा लेकिन उस समय कुस्ती की एबीसीडी सन्दीप को नही आती थी ।  इस खेल मे धीरे धीरे सन्दीप का एसा मन लगा कि अब दौड लगाने के बताय सन्दीप रोजाना साथी बच्चो के साथ खेत मे कुस्ती लडने लगा । सन्दीप ने एक दिन अपनी मॉ श्रीमति महिपाली को बताया की मै पहलवान बनना चहाता हू । सन्दीप की मॉ ने सन्दीप के पिताजी बिजेन्द्र सिंह को कहा कि यह देखो सन्दीप कहता है कि पहलवान बनुगॉ सारे कपडे मिट्टी मे रगड कर लाता है। अब तो सन्दीप का भाई और बहन भी सन्दीप को पहलवान कहने लगे थे । सन्दीप के पिता बिजेन्द्र सिंह ने सन्दीप की मेहनत व लग्न को देखकर निकट के गॉव जन्धेडी मे खलीफा लख्मीचन्द  के पास छोड दिया । सन्दीप पोसवाल अब कुस्ती के रास्ते पर चल पडा था । बाद मे सन्दीप पोसवाल ने मेरठ और बम्भेटा मे भी अभ्यास किया । पहलवानी के साथ सन्दीप पोसवाल ने पढाई भी जारी रखी वर्तमान मे सन्दीप बीजीएमसी कर रहा है। 
सन्दीप की की उपलबि्ियो की बात करे तो सन्दीप पोसवाल  आल इण्डिया यूनिवर्सिटी चैम्पियन  7 बार 125 किलो मे रह चुके है। यहि नही यूपी रूस्तम और सितारा इन्दौर के खिताब भी संन्दीप पोसवाल के नाम है। सन्दीप पोसवाल शाकाहारी पहलवान है। जो घी दूध बदाम फल जूस जैसे अहार के बल पर अपनी पहलवानी को नई दिशा देने मे लगे हुये है।
रविन्द्र शामली
कुस्ती जगत

Tuesday, October 22, 2019

चुनौतियो से लडना मानव का कर्म :- अर्जुन पहलवान



रविन्द्र शामली - आप अब तक कितने दंगल करा चुके अर्जुन पहलवान जी ?

अर्जुन पहलवान - छोटो मोटे दंगलो की गिनती तो याद नही है। बडे दंगलो की बात करे तो यह 32 वॉ दंगल है।

रविन्द्र शामली -सबसे बडा इनाम इस दंगल मे कितना रखा गया है ?

अर्जुन पहलवान - सबसे बडा इनाम पहले हमने चार लाख रू0 रखा था फिर अमित प्रमुख जी बोले के भाई अर्जुन एक लाख रू0 मेरी तरफ से ,  आखिरी कुस्ती पॉच लाख रू0 के इनाम पर होगी ,  फिर आखिरी कुस्ती का इनाम  पॉच लाख कर दिया गया । 

रविन्द्र शामली - कम शब्दो मे कहे तो दंगल क्या है ?

अर्जुन पहलवान - सच कहे तो दंगल हमारी संस्कृति का हिस्सा है। जिसके माध्यम से युवा मजबूत होते है और यही से मजबूत समाज का निर्माण होता है। समाज मजबूत होगा तो देश भी मजबूत होगा । 

रविन्द्र शामली - इस सफल आयोजन के लिये किन- किन चुनौतियो का सामना करना पडा ?

अर्जुन पहलवान -कोई भी काम हो चुनौतिया हर कार्य मे आती है। चुनौतियो से लडना मानव का कर्म भी है। और धर्म भी है। मै चुनौतियो से लडा और नतिजा आपके सामने है। 

रविन्द्र शामली - फिर भी सबसे बडी चुनोतिया कौन सी रही  ?

अर्जुन पहलवान - यह दंगल उन कार्यो मे से एक था जो सर्व समाज के सहयोग से होते है। मै कई महीने तक सहयोग के लिये  लोगो से मिला कुछ अच्छे लोग मिले कुछ बुरे मिले । कई खट्टे मीठे अनुभव हुये । इस चुनौती को पार किया । मेरे सामने  दूसरी चुनौती थी बहार से आने वालो को पूरा सम्मान देने की जिसमे मुझे सौ प्रतिशत सफलता मिली । 

रविन्द्र शामली - आपकी सबसे बडी ताकत क्या है ? 

अर्जुन पहलवान -बाबा जी फूलशन्दे जी का आशिर्वाद है। मॉ बाप का आशिर्वाद है। मेरे भाई भतीजे बच्चे मेरी आज्ञा का पालन करते है बस यही मेरी ताकत है। 

रविन्द्र शामली - आप सब भाईयो के नाम महाभारत के पात्रो पर रखे गये है। लोग पूछते है  क्यो  ? 

अर्जुन पहलवान - कहा जाता है कि हमारे गॉव मे कभी पॉचो पाण्डव आये थे और यहॉ पर रूके गॉव का नाम पचैण्डा तभी पडा था । पिताजी भी पहलवान रहे है अपने समय के , वे एतिहासिक बातो को आगे बढाने मे विश्वास रखते है। इन्हीं बातो से प्रभावित होकर पिताजी ने हम पॉचो भाईयो के नाम पाण्डवो के नाम पर रख दिये थे । 

रविन्द्र शामली - आपके अखाडे पचैण्डा कला मे कौन - कौन सी सुविधा उबलब्ध है ?

अर्जुन पहलवान -दौड के लिये ग्राउन्ड है,  मैट है,  जिम है ,  मैट हॉल तैयार हो रहा है। 

रविन्द्र शामली - आपके बारे मे एक बात कही जाती है कि अर्जुन पहलवान बात को मुह पर कहने वालो मे से है। जबकि आज के दौर मे ये  विचार धाराये बदल रही है। इस विषय पर आपकी क्या राय है ? 

अर्जुन पहलवान - विचारधाराये बदलने का सबसे बडा कारण है। आज के दौर मे लोग अपना नफा नुकशान ज्यादा देखते है। लेकिन मै इन बातो से इत्तेफाक़ नही रखता हू । मै किसी के प्रति कोई द्वेष नही रखता हू । मुझे   जिसे जो कहना होता है उसे उसके मुह पर ही कहने मे विश्वास रखता हू ।  

रविन्द्र शामली - पाठको के लिये क्या संदेश देना चाहोगे ?

अर्जुन पहलवान - यही कहना चाहूगॉ कि अच्छा काम करोगे तो सम्मान मिलेगा ,  बुरा काम करोगे तो गालिया । यही दो चीजे साथ जाती है बाकी कुछ नही साथ जाता इसलिये अच्छे काम करो । अपने बच्चो को सदाचार की बात सिखाया करो , अपने मॉ बाप की सेवा किया करो यही सबसे बडा तीर्थ है। 
                                                                                   समाप्त
साक्षातकार कर्ता 
रविन्द्र शामली 
कुस्ती जगत  

Wednesday, October 16, 2019

पत्रकारिता मेरे खून मे है:-नरेन्द्र चिकारा


नरेन्द्र सिंह चिकारा जिला शामली का एक एसा पत्रकार है जिसकी  कर्मठता को देखकर दूसरे लोग भी बहुत कुछ सीख सकते है। पत्रकारिता को समर्पित एसा जज्बा कम ही देखने को मिलता है। कोई भी क्षेत्रिय खबर नरेन्द्र सिंह चिकारा से बच कर निकल जाये यह सम्भव नही है।  नरेन्द्र सिंह चिकारा ने जिला शामली के पत्रकारो मे अपनी अलग साफ स्वछ छवी बनाई है। यह छवी उनके कार्य और उनके पत्रकारिता मे दिये गये योगदान का परिणाम है।  नरेन्द्र सिंह चिकारा का  रूतबा इसी बात से बखुबी नापा जा सकता है कि  चिकारा जी के द्वारा भेजी गई खबरे ज्यो की त्यो  अखबार द्वारा छापदी जाती है। कभी कोई कटिगं नही की जाती वर्तमान मे चिकारा जी जनवाणी अखबार मे अपनी सेवाये देते है। नरेन्द्र सिंह चिकारा  के योगदान को देखते हुये कई अखबार  चहाते है कि नरेन्द्र सिंह चिकारा उनके अखबार मे काम करे । लेकिन नरेन्द्र सिंह अखबार बदलने मे नही बल्कि जहॉ पर है वही पर काम करने को बेहतर मानते है। पत्रकारिता नरेन्द्र सिंह की मजबूरी नही बल्कि शौख है। नरेन्द्र सिंह कहते है कि पत्रकारिता तो मेरे खून मे है,  यह मेरा शौख है,  मेरा जनून है इसलिये मै इसे नही छोड पाता हू । गडे मुर्दो को उखाडकर सच्चाई सामने लाने की महारत नरेन्द्र सिंह चिकारा को बखुबी हासिल है।  नरेन्द्र सिंह वो पत्रकार है जो वास्त्विक व सच्चे विषयो से जनवाणी अखबार के माध्यम से समाज को सच का आईना दिखाता है। नरेन्द्र सिंह के विरोधी हर बार उनकी कलम के सामने घुटने टेकने को मजबूर हो जाते है। नरेन्द्र सिंह कहते है कि कलम ही मेरी की ताकत है,  कलम ही मेरा हथियार है।   समाज को एसे ही निष्पक्ष पत्रकारो की जरूरत है। 
रविन्द्र शामली
कुस्ती जगत

Monday, September 16, 2019

मै सरकार की नीतियो का शिकर :- सचिन (पैरा ओलम्पियन)


उत्तर प्रदेश मे खेल और खिलाडी लगातार दम तोडते जा रहे है। जब किसी अच्छे खिलाडी की अवहेलना होती है तो खेल कमजोर होता ही है। कई गलत नीतियो के कारण खिलाडियो का मनोबल टूट जाता है। जिससे नये आने वाले खिलाडी भी सिनियर खिलाडी की दुर्दशा को देखकर अपना रास्ता बदल लेते है। या खेल को छोड देते है। उत्तर प्रदेश के जिला मेरठ के निकट रोहटा मे 8-01-1984 को जन्मे सचिन कुमार को खेल से बचपन से ही काफी प्यार था । बचपन मे खेलते - खेलते पता चला कि देश मे पैरा खेल भी होते है। तो सचिन कुमार ने पैरा पावर लिफटिंग मे  किस्मत को आजमाया । सचिन कुमार की लगातार लम्बे समय से की गई मेहनत रंग लाई , और देखते ही देखते सचिन कुमार के कदम आगे बढने लगे । सचिन कुमार  की मेहनत का ही कमाल था कि सचिन कुमार ने पैरा  पावर लिफ्टिंग नेशनल मे 10 गोल्ड प्राप्त कर डाले । देश के लिये पैरा ओलम्पिक मे प्रतिनिधित्व भी किया । तीन बार एशियन गेम्स (पैरा) मे देश का प्रतिनिधित्व किया । कोमनवेल्थ गेम्स मे  ब्रोन्ज मेडल प्राप्त किया , 11 इंटरनेशनल मेडल प्राप्त  किये  , देश के कई बडे नेताओ ने भी सचिन कुमार को अपने पास बुलाकर सचिन की खूब तारीफ  की  , यही नही प्रधानमन्त्री श्री नरेन्द्र मोदी जी भी सचिन को बुलाकर मुलाकात कर चुके है। इतना सब होने के बावजूद सचिन कुमार को आज तक नौकरी नही मिली । नेताओ को सचिन यह समझाने मे सदा नाकामयाब रहे कि पेट नौकरी से भरता है , ना कि मुलाकातो और फोटो खिचवाने से । सचिन कुमार को आश्वासन लगातार मिलते गये । लेकिन नौकरी आज तक ना मिली । आखिर मे तंग आकर सचिन कुमार मेरठ मे 09 सितम्बर 2019 को  धरने पर बैठ गये , तब जाकर प्रशासन के थोडे से कान खडे हुये । जिसके बाद सचिन को खेल मन्त्री से मिलवाने की बात कही गयी । तब सचिन कुमार की ओर से 15 सितम्बर 2019 को  धरना स्थगित किया गया । जल्दी ही सचिन कुमार को खेलमन्त्री से मिलवाया जायेगा । सचिन कुमार को जिस दिन नौकरी मिलेगी वो नौकरी किसी मेडल से कम ना होगी । देखना होगा यह नौकरी रूपी मेडल सचिन कुमार को कब प्राप्त होता है। न्याय की लडाई मे आप सब सचिन कुमार का साथ दे ।

रविन्द्र शामली
कुस्ती जगत 

Monday, July 29, 2019

कर्म ही मेरी पूजा : चौधरी सुरेन्द्र सिंह


कस्बा ऊन को तहसील बने हुये  काफी दिन बीत गये थे । अनेंको अधिकारी आये और चले गये । किसी को कोई याद नही रहा । समय अपने रास्ते पर चलते हुये भला कहॉ किसी के लिये रूकता है। एक दिन वो समय आया जिसका सायद तहसील ऊन इन्तजार कर रही थी । उस दिन  तहसील ऊन की किसमत चमक उठी क्योकि इस तहसील को एक कर्मठ , इमानदार , निडर अधिकारी उपजिलाधिकारी के रूप मे चौधरी सुरेन्द्र सिंह मिले अपने शानदार कर्तव्य का निर्वाहन करते हुये चौधरी सुरेन्द्र सिंह ने अनेको रूके पडे कार्यों को पूरा किया । ऊन क्षेत्र मे चौधरी सुरेन्द्र सिंह ने बेमिशाल कार्य किये तथा विकास को नई दिशा दी , उपजिलाधिकारी के कार्यो की बदौलत आज क्षेत्र का एक - एक बच्चा सहाब को जानता है। वे  क्षेत्र धन्य है। जिन्हे एसे देवता रूपी कर्मशील अधिकारी मिलते है। एसे कर्मठ अधिकारी को क्षेत्र मे यदि लम्बा समय कार्य करने को मिल जाये तो क्षेत्र स्वर्ग बन जाये । चौधरी सुरेन्द्र सिंह जैसे दिगगज अधिकारियों की वजह से ही समाज मे लोगो का कानून पर भरोसा टिका हुआ है। चौधरी सुरेन्द्र सिंह सही को सही , गलत को गलत , बताने का दम रखते है। क्षेत्र मे निष्पक्ष रूप से कार्य करने के लिये लोग  चौधरी सुरेन्द्र सिंह को सच मुच का इनसान भी कहते है। अतः कहा जा सकता है कि चौधरी सुरेन्द्र सिंह जी ऊन क्षेत्र के लिये किसी संजीवनी से कम नही है। चौधरी सुरेन्द्र सिंह कहते है कि कर्म ही मेरी पूजा है। इस कुर्सी पर बैठने से पहले जो संवैधानिक कसम खाई थी उसे निस्वार्थ भाव से निभाया है। और आगे भी निभायेगे । 

रविन्द्र शामली
कुस्ती जगत 

Tuesday, April 30, 2019

पहलवान उदय चन्द पर विशेष




महान पहलवान उदय चन्द (अर्जुन अवार्डी ) का जन्म हरियाणा के हिसार के पास एक छोटे से गॉव जाण्डली मे 25 जून 1935 को हुआ था । बचपन से ही उदय चन्द कुस्ती के शौकीन थे । अपने भाई हरिराम के साथ उदय चन्द कुस्ती का  अभ्यास किया करते थे । भारतीय  सेना मे भर्ती होने के बाद उदय चन्द के सपने आसमान छूने लगे थे । 

उदयचन्द का संघर्ष
उन्होंने योकोहामा में 1961 में हुई विश्व कुश्ती चैंपियनशिप में  कांस्य पदक जीता था। एक बार उदय चन्द विश्व चैंपियन महेमद.अली सनातनकर के खिलाफ अपने मुकाबले के दौरान विशेष रूप से बदकिस्मत रहे थे क्योंकि 1.1 ड्रॉ में मुकाबला समाप्त हो गया। भlरत सरकार ने उनकी उपलब्धियों के लिए उन्हें भारत के राष्ट्रपति द्वारा 1 9 61 में कुश्ती में प्रथम अर्जुन पुरस्कार प्रदान किया था। श्री उदय चन्द जी ने तीन ओलिम्पक मे भाग लिया रोम 1 9 60 , टोक्यो 1 9 64 , मैक्सिको सिटी 1 9 68 और मैक्सिको सिटी में क्रमशः 6 वां स्थान पर रहे। श्री उदय चन्द जी ने एशियाई खेलों में दो बार भाग लिया 1 9 62 के एशियाई खेलों जकार्ता में 70 किलो ग्रेको.रोमन में दो रजत पदक जीते और 1 9 66 एशियाई खेलों बैंकाक में 70 किलो फ्रीस्टाइल में कांस्य पदक जीता। इसके अलावा उन्होंने चार अलग.अलग विश्व कुश्ती चैंपियनशिप यानी योकोहामा 1 9 61, मैनचेस्टर 1 9 65, दिल्ली 1 9 67 और एडमोंटन 1970 में भाग लिया। उन्होंने स्कॉटलैंड के एडिनबर्गए 1 9 70 में ब्रिटिश राष्ट्रमंडल खेलों में स्वर्ण पदक के साथ अपने शानदार कैरियर को चार चॉद लगा दिये और खेलो से सन्यास ले लिया वह 1 9 58 से 1 9 70 तक भारत में निर्विवाद राष्ट्रीय चैंपियन बने रहे। 

कोच के रूप मे उदय चन्द की सेवाये 
बाद का जीवन भारतीय सेना से रिटायर होने के बाद उन्होंने चौधरी चरण सिंह हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय  हिसार में एक कोच के रूप में शामिल होकर 1 9 70 से 1 99 6 तक अपनी सेवाएं दीं। उनके समय के दौरान कई अंतरराष्ट्रीय स्तर के पहलवानों तैयार हुये और विश्वविद्यालय टीम को कई अखिल भारतीय अंतर विश्वविद्यालय चैंपियनशिप में जीत।दिलाई 

धुम्रपान उदयचन्द की कमजोरी 
श्री उदय चन्द जी बीडी हुक्का पिया करते थे कभी कभी तम्बाकु का भी सेवन करते थे । श्री उदय चन्द खुद मानते है की ये मेरी सबसे बडी कमजोरी थी जिसका मुझे तमाम उम्र मलाल रहेगा यदि मै तम्बाकु बीडी सिगरट का सेवन न करता तो करीब 15 मेडल और अधिक जीत सकता था और विश्व चैम्पियन होता । 


अपने भाई के साथ 
विश्व चैम्पियनशिप मे जाना 
उदय चन्द जी अपने भाई हरिराम के साथ विश्व चैम्पियनशिप मे हिस्सा लेने साथ गये थे भारत के इतिहास मे ऐसा पहली बार था कि एक मॉ के दो बेटे विश्व चैम्पियनशिप मे गये हो आज समय की धरा मे बहते बहते हो सकता है लोग उदय चन्द को भूल गये हो परन्तु भारत   का कुस्ती इतिहास उन्हे  कभी नही भुला सकता

कुछ लोग उदयचन्द को कहते है घमण्डी 
हालाकि कई लोग उदयचन्द को घमण्डी व बडबोला भी कहते है। लेकिन उदय चन्द इन बातो की परवाह नही करते अच्छा पहलवान होने के बावजूद उदयचन्द को काफी मेहनत करनी पडी 

जब उदय चन्द पर भरी पडी 
राजनीति
उदय चन्द बताते है कि मुझे ओलम्पिक मे 67 कीलो मे भाग लेना था जबकी मुझे 74 कीलो मे भेजा गया और मेरी जगह 67 किलो मे गुरू हनुमान के शिष्य ज्ञान प्रकाश पहलवान को भेजा गया जबकि मै ज्ञान प्रकाश को आसानी से हराया करता बाद मे मुझे पता चला कि गुरूहनुमान ने ज्ञान प्रकाश को कम वजन मे उतारने के लिये भारतीय ओलम्पिक संघ के अश्विनी कुमार से सिफारिश कराई थी उदयचन्द कहते है कि मुझे यदि मेरे वजन 67 कीलो मे हिस्सा लेने दिया जाता तो मै निश्चित ही ओलम्पिक से पदक जीत जाता क्योकि जिस अमेरिकी पहलवान से ज्ञान प्रकाश बहुत कम अन्तर से हारा उसे स्वर्ण पदक मिला था और मै ज्ञान प्रकाश को आसानी से हरा लिया करता था । 

पहला ओलम्पिक और उदयचन्द 
पहलवान उदय चन्द के कैरियर की सुरूवात ही उस समय हुई थी जिस समय खेलो की हालत दयनिय थी जीतने पर भी कोई नही बूझता था । देश मे खेल संघो के अध्यक्ष जरूर उदयोगपति होते थे । लेकिन खिलाडी जरूर एक एक पैसे के मोहताज हुआ करते थे । पहलवान उदयचन्द कुस्ती जगत का वो कोहीनूर है जो देश की तरफ से 1960 मे कुस्ती के खेल मे हिस्सा लेने के लिये रोम के अन्दर ओलम्पिक मे खेलने गया । उदयचन्द से पहले कोई भी भारतीय पहलवान कभी भी ओलम्पिक मे खेलने नही गया था । पहलवान जी वहॉ की चमक दमक देखकर हैरत मे पड गये । वहॉ पर सब कुछ अलग था । भारतीय अधिकारी वहॉ की ए बी सी डी नही जानते थे । जब पहलवान उदयचन्द जी अखाडे रूपी मैट पर कुस्ती लडने के लिये गये तो रेफरी ने कहा की जूते पहन कर आओ तब उदय चन्द को पता चला था की यहॉ पर जूते पहनकर कुस्ती लडी जाती हैं । पहलवान जी जूते पहन कर दोबारा मैट पर गये और कुस्ती लडी लेकिन परिणाम अनुरूप ना आये । क्या एसी हालत मे पदक जीता जा सकता है। 

तीन बार मा0 चन्दकी राम से हुई कुस्तीय नही निकला परिणाम 
पहलवान उदयचन्द की तीन वार कुस्तीया मास्टर चन्दगीराम जी के साथ हुई कभी परिणाम नही निकल सका और कुस्ती बराबरी पर रही  

जब उदयचन्द ने बचाई देश की लाज 

एक समय की बात है दिल्ली मे कुस्तीया चल रह थी रूस्तमे पाकिस्तान पहलवान मौलाबक्स की कुस्ती भारत के नामचीन पहलवान श्री मेहरदीन के साथ हुई कुस्ती बराबरी पर रही किसी ने मौला बक्स को ये कह दिया कि कुस्ती मिलकर हुई है। इस बात पर पाकिस्तानी पहलवान मौलाबक्स भडक उठा और उसने भारतीय पहलवानो को चुनौती दे डाली किसी भी भारतीय पहलवान ने मौलाबक्स की चुनौति स्वीकार नही की तब गुरू हनुमान और मुरलीधर डालमिया ने उदयचन्द से मौलाबक्स के साथ कुस्ती लडने की गुहार लगाई तब उदय चन्द ने ये कुस्ती लडी और तीनवे मिन्ट मे मुलतानी दाव लगाकर उदयचन्द ने मौलाबक्स को चित किया 


कई  उपलब्धिया प्रथम बार उदय चन्द के नाम है दर्ज 

उदयचन्द अपने समय के एसे खिलाडी रहे है। जिनके नाम कुस्ती जगत के अनेक रिकोर्ड प्रथम बार उनही के नाम दर्ज है।
प्रथम: खिलाडी जो ओलंपिक में गए
प्रथम: अर्जुन अवार्ड विनर
प्रथम: विश्व चैम्पियनशिप से पहले पदक विजेता
प्रथम: खिलाडी जो ओलंपिक में तीन बार गए
प्रथम: खिलाडी जो भाई के साथ विश्व चैम्पियनशिप में गए
प्रथम: 1700 से ज्यादा शिष्य पहलवान खिलाडी सरकारी नौकरीयो पर गए (हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय)

जब हरियाणा के मुख्यमन्त्री ने उदय चन्द से मिलने को किया इन्कार 

21-august-2017 को लोग अपना सरकारी दफतरो में काम नही होने के चलते मुख्यमन्त्री महोदय के दरबार मे अपनी शिकायत लेकर पहुचे थे । मुख्यमन्त्री के दरबार मे करीब 500 शिकायतकर्ता आये थे इनमे एक हमारे देश के महान पहलवान 87 वर्षीय चौधरी उदयचन्द भी पहुचे थे , उदयचन्द कुस्ती के खेल के पहले ओलम्पियन है। , पहले अर्जुन अवार्डी है। , तथा विश्वचैम्पियन शिप से पहले पदक जीतकर लाने वाले पहलवान है। पहलवान उदयचन्द भी आम लोगो के साथ मे गर्मी के दौरन लाईन मे लगे नजर आये थे , सीएम के अधिकारीयो द्वारा सभी शिकायतकर्ताओ को एक एक स्टीकर दे दिया गया था । मुख्यमन्त्री के सामने सुरेश कुमार (दिव्यागं) शिक्षक ने गुहार लगाई थी की मेरी पत्नी भी अध्यापिका है। और हमारी एक बेटी है। जो दिव्याग है। अतः हमारी न्युक्ति रोहतक के पास करवादो लेकिन मुख्य मन्त्री महोदय ने नियमो का हवाला देते हुये ऐसा करने से मना करदिया था , कुछ लोग अपने आपको पक्का करने की मॉग लेकर पहुचे मुख्यमन्त्री महोदय ने कहा की एसा नही हो सकता शिकायत कर्ता बोले की हमारे बाद के लोग कैसे पक्का करदिये गए इस पर मुख्यमन्त्री महोदय बोले की कोर्ट चले जाओ । यह सब देख रही एक महीला शिकायतकर्ता झल्लाकर बोली थी , जब कोई समाधान ही नही हो रहा तो बन्द करो ये दरबार इस पर मुख्यमन्त्री बोले थे की आप मुझे अपनी शिकायत दो अपना दर्द नही 
उदय चन्द ने यह सब अपनी नजरो से देखा ........... नामचीन पहलवान चौधरी उदयचन्द को मुख्यमन्त्री महोदय ने समय नही दिया लाईन मे लगे उदयचन्द के साथ लोग सेल्फी ले ले कर जा रहे थे लेकिन मुख्यम्न्त्री महोदय ने पहलवान उदयचन्द को समय ना देना ही बेहतर समझा , क्यो बेहतर समझा यह तो मुख्यमन्त्री महोदय ही जानते होगे उदयचन्द पहलवान की खुबी है कि वे कभी भी बडे से बडे नेता और खेल अधिकारियों के सामने ना कभी झुके, ना डरे , ना चमचागिरी की -----------  
उदयचन्द के दिल मे है कई बाते 
उदयचन्द कहते है कि  कुस्ती के पैरोकार और अधिकारी  उदयचन्द  पहलवान को भूल चुके है ना कभी  मुझे  पदम श्री के लायक समझा गया ना ही द्रोणाचार्य के मै  सुरू से लेकर आखिर तक उपेक्षा का शिकार  होता रहा 

जब भारतीय जनता पार्टी की सरकार बनी तब मुझे कुछ आस जगी थी लेकिन नतिजा वही एक डाक के तीन पात चौथा लगे ना पाचवे की आस वाला ही साबित हुआ । 
साक्षातकार  कर्ता 
रविन्द्र शामली 
कुस्ती जगत