Sunday, April 14, 2019

चौधरी महेंद्र सिंह टिकैत पर विशेष

  

लेखक -चौधरी मानवेन्द्र सिंह तोमर ,

संलग्न कर्ता- 
रविन्द्र शामली 
कुस्ती जगत ,


चौधरी महेंद्र सिंह टिकैत का जन्म मुजफ्फरनगर के कस्बा सिसौली में 6 अक्टूबर 1935 में एक किसान परिवार में हुआ। गांव के ही एक जूनियर हाईस्कूल में कक्षा सात तक पढ़ाई की। पिता का नाम चौहल सिंह टिकैत और माता का नाम श्रीमती मुख्त्यारी देवी था। चौधरी चौहल सिंह टिकैत बालियान खाप के चौधरी थे। पिता की मृत्यु के समय चौधरी महेंद्र सिंह टिकैत मात्र आठ साल के थे। आठ वर्ष की आयु में इन्हें बालियान खाप की जिम्मेदारी संभालनी पड़ी। सर्वखाप मंत्री चौधरी कबूल सिंह के सहयोग से चौधरी टिकैत ने अपनी जिम्मेदारी का निर्वाह किया। चौधरी टिकैत ने वर्ष 1950, 1956, 1963, 2006, 2010 में बड़ी सर्वखाप पंचायतों में पूर्ण रूप से भागीदारी रखते हुए दहेज प्रथा, मृत्युभोज, दिखावा, नशाखारी, भ्रूण हत्या आदि जैसी सामाजिक कुरीतियों, बुराइयों पर नियंत्रण करने में महत्वपूर्ण योगदान दिया। 1986 में बने भाकियू के राष्ट्रीय अध्यक्ष वर्ष 1986 में किसान, बिजली, सिंचाई, फसलों के मूल्य आदि को लेकर पूरे उत्तर प्रदेश के किसान आंदोलित थे। तब एक किसान संगठन की आवश्यकता महसूस की गई। तब 17 अक्टूबर 1986 को सिसौली में एक महापंचायत हुई, जिसमें सभी जाति-धर्म व सभी खापों के चौधरियों, किसानों व किसान प्रतिनिधियों ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया और सर्वसम्मति से चौधरी महेंद्र सिंह टिकैत को भारतीय किसान यूनियन का राष्ट्रीय अध्यक्ष मनोनीत किया गया। पंद्रह साल के संघर्ष के परिणाम स्वरूप किसानों का कर्जा पूर्ण रूप से भारत सरकार द्वारा माफ किया गया तथा किसानों को उर्वरक सब्सिडी भाकियू की मांग के आधार पर सीधे देने की घोषणा की गई। साथ ही पिछली वार्ताओं के कारण आज कृषि ऋण का ब्याज 12 प्रतिशत से घटकर चार प्रतिशत तक पहुंचा है। भारतीय किसान यूनियन द्वारा 2006 में प्रधानमंत्री को विश्व व्यापार संगठन में कृषि पर करार रोकने के लिए 25 लाख किसानों के हस्ताक्षर सौंपे गए, जिस कारण यह करार नहीं हो पाया। वर्ष 2004 से आज तक भाकियू के विरोध के कारण सीड्स बिल संसद में पास नहीं हो पाया।

किसानों की समस्याओं पर मुखर

वर्ष 2001 से 2010 तक जंतर-मंतर नई दिल्ली में किसानों की समस्याओं जैसे विश्व व्यापार संगठन, बीज विधेयक 2004, जैव परिवर्तित बीज, किसानों के कर्ज माफी, फैसलों का उचित लाभकारी मूल्य आदि को लेकर प्रत्येक वर्ष विशाल किसान पंचायत का सफल आयोजन किया। अस्वस्थता के दौरान भी चौ. टिकैत फरवरी 2011 में प्रेस के माध्यम से ऐलान किया कि देश के प्रधानमंत्री किसानों की समस्याओं पर गंभीर नहीं हैं। अगर प्रधानमंत्री किसान प्रतिनिधिमंडल से वार्ता नहीं करते तो दिल्ली को चारों तरफ से बंद किया जायेगा। इससे घबराकर प्रधानमंत्री ने 8 मार्च 2011 को ही किसान प्रतिनिधि मंडल को बुलाकर वार्ता की। अस्वस्थता के चलते चौ. टिकैत इस वार्ता में नहीं जा सके। भारत के प्रधान मंत्री डा.मनमोहन सिंह ने फोन कर चौ. टिकैत के स्वास्थ्य की जानकारी लेते हुए किसान समस्याओं को गंभीरता से विचार करने का आश्वासन दिया। चौ. टिकैत ने ठीक 7 बजकर 08 मिनट पर अंतिम सांस ली। उनके निधन की खबर मिलते ही हर तरफ शोक की लहर व्याप्त हो गई। चौधरी महेंद्र सिंह टिकैत भाकियू के गठन के बाद से ही संगठन के राष्ट्रीय अध्यक्ष थे। 24 साल तक वही इस संगठन के सर्वेसर्वा रहे।


कामयाबी के पीछे पत्नी का हाथ 
बाबा के नाम से मशहूर किसान मसीहा चौधरी टिकैत की कामयाबी के पीछे उनकी स्वर्गीय पत्नी बलजोरी का हाथ था। बलजोरी देवी अधिक शिक्षित नहीं थी, लेकिन उन्हें टिकैत के बालियान खाप का मुखिया होने का अहसास था। बलजोरी देवीे चौधरी टिकैत के प्रत्येक कार्य का विशेष ध्यान रखती थीं। खेत से लौटने के बाद बलजोरी देवी टिकैत के हुक्का-पानी व खाना आदि का विशेष ध्यान रखती थीं। 1987 में भाकियू के गठन के बाद बलजोरी देवी ने कंधे से कंधा मिलाकर हर कार्य में टिकैत का साथ दिया। भाकियू को विशेष पहचान देने वाले करमूखेड़ी आंदोलन में बलजोरी देवी ने अपने साथ सैकड़ों मातृशक्ति को लेकर धरने पर उनका नेतृत्व किया। समय-समय पर बलजोरी देवी टिकैत को सलाह भी देती थीं, जिसे टिकैत अमल में भी लाते थे। चौधरी टिकैत ने बलजोरी देवी की सक्रियता के चलते उन्हें महिला विंग की राष्ट्रीय अध्यक्ष घोषित कर दिया था। जिस के चलते उन्होंने धरने प्रदर्शनों में बढ़ चढकर हिस्सा लेना शुरू कर दिया था। लखनऊ पंचायत में हुए लाठीचार्ज में बलजोरी देवी गंभीर रुप से घायल हो गयी थीं। बावजूद इसके उन्होंने हिम्मत नहीं हारी। बलजोरी देवी ने टिकैत को घर-बार व खेत खलिहानों की चिंता से पूरी तरह मुक्त कर रखा था। टिकैत की माता के देहांत के बाद बलजोरी देवी के जिम्मे पूरे घर की देखभाल थी। बीमारी के चलते अंतिम समय में बलजोरी देवी काफी समय तक बिस्तर पर रहीं, लेकिन तब भी उन्होंने हिम्मत नहीं हारी और चौधरी टिकैत को प्रोत्साहित करती रहीं। इसके अलावा महिला विंग की कार्यकत्रियों में भी जोश भरती रही।

किसान ज्योति बुझी
किसानों के मसीहा और भारतीय किसान यूनियन के राष्ट्रीय अध्यक्ष महेंद्र सिंह टिकैत की रविवार को प्रात: सांसें थमते ही सिसौली में किसान ज्योति भी बुझ गयी। इसे संयोग या यूं कहें कि किसान पुत्र की अंतिम विदाई को यह किसान ज्योति भी सहन नहीं कर सकी। सिसौली में बने किसान भवन परिसर स्थित किसान ज्योति करीब पांच दशकों से जल रही थी। एक छोटे से कमरे में स्थित इस पीतल के बड़े से कटोरे में जली ज्योति को हवा और बारिश से बचाने के लिए चारों ओर शीशे लगे हुए हैं। यह किसान ज्योति बाबा के घर से किसान भवन परिसर में वर्ष 1988 में स्थापित कर दी गयी थी। इससे पहले यह किसान ज्योति भाकियू सुप्रीमो के घर जलती थी। बाबा टिकैत ही इसे जलाते थे। अब बाबा की तरह यह किसान ज्योति भी इतिहास बन गयी है। इस ज्योति को जलाने की प्रेरणा उन्हें हरिद्वार स्थित शांतिकुंज की अखंड ज्योति से मिली थी। बाद में वहीं किसान ज्योति सिसौली स्थिति किसान भवन में किसानों के शक्ति का केन्द्रीय स्थल बना। किसानों के मन में बाबा टिकैत की तरह ही किसान ज्योति के लिए श्रद्धा और आदर का भाव था। बाबा और ज्योति एक रूप थे। 15 मई 2011 को बाबा के प्रयाण के साथ ही किसान ज्योति भी बुझ गई।

मौन हो गया धरतीपुत्रों का रहनुमा
खेड़ीकरमू की घटना के बाद प्रदेश व देश की सरकार को टिकैत की ताकत का अहसास हो गया था। भोपा का नईमा प्रकरण हो या समय-समय पर हुए गन्ना आंदोलन। हमेशा सरकारों ने टिकैत के आगे सिर नवाया। टिकैत एक ऐसा नाम रहा जो किसानों के स्वाभिमान को लेकर कभी नहीं झुका और उनके आंदोलन इतिहास बन गए। चौ. महेन्द्र सिंह टिकैत इस दुनिया में नहीं रहे। लेकिन उनके नेतृत्व में हुए किसानों के आंदोलन इतिहास बन गए हैं। किसान आंदोलनों में बाबा टिकैत ने कभी अपनी जान की परवाह नहीं की। किसान उत्पीड़न पर वह हमेशा सरकार और प्रशासन के सामने दीवार बनकर खड़े रहे। खेड़ीकरमू में दो किसानों की हत्या के बाद उग्र आंदोलन के चलते किसानों ने जब एक पीएसी जवान को मार डाला तो प्रशासन और सरकार किसानों की ताकत को समझ गई। मुख्यमंत्री वीर बहादुर सिंह से लेकर कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी तक ने टिकैत के आगे शीश नवाया है। मुख्यमंत्री रहते वीर बहादुर सिसौली आए थे। बीते वर्ष किसान व किसान नेताओं के उत्पीड़न के खिलाफ विदुरकुटी (दारानगरगंज) में स्वाभिमान बचाओ रैली हुई थी। जिसमें रालोद सुप्रीमो चौधरी अजित सिंह समेत किसान मसीहा चौधरी महेन्द्र सिंह टिकैत ने शिरकत की थी। रैली के मंच से सूबे में किसानों के उत्पीड़न के खिलाफ बाबा टिकैत ने प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती को युद्ध के लिए ललकारा था। यही नहीं उन्होंने मायावती के खिलाफ तल्ख टिप्पणी भी की थी। जिससे सूबे की राजनीति में हड़कंप मच गया था। इस टिप्पणी के आरोप में भाकियू सुप्रीमो स्वर्गीय टिकैत के खिलाफ बिजनौर शहर कोतवाली में मुकदमा दर्ज कर उनकी गिरफ्तारी की तैयारी की गई थी। इसके लिए बिजनौर, मेरठ, मुजफ्फरनगर जिलों के कई थानों की पुलिस तमाम रास्तों की नाकेबंदी करती रही, पुलिस के कप्तानों समेत बड़े अधिकारी सड़कों पर दौड़ लगाते रहे, लेकिन बाबा प्रशासन की सभी नाकेबंदी को तोड़कर सुरक्षित सिसौली पहुंच गये। प्रशासन ने सिसौली गांव की घेराबंदी की, तो किसानों ने जमकर विरोध किया। लेकिन भाकियू अध्यक्ष न सरकार से डरे और न झुके। आखिरकार प्रदेश सरकार को ही लचीला रुख अपनाना पड़ा। भाकियू अध्यक्ष के मन में हमेशा किसानों का दर्द छलकता रहा। तीन दिन पहले उन्होंने अपनी लड़खड़ाती आवाज में कहा था कि मेरे शरीर की हड्डियां अगर जवाब न देती तो सरकार को हिला देता।

मेरठ की आग से भड़के थे शोले
बाबा टिकैत के इंकलाबी इतिहास में मेरठ का नाम स्वर्ण अक्षरों में दर्ज है। देश ही नहीं पूरी दुनिया में मेरठ और भाकियू एक साथ सुर्खियों में रहे थे। कह सकते हैं मेरठ के आंदोलन की राह पर चलकर ही टिकैत ने दिल्ली के हुक्मरानों की नाक में नकेल डाली थी। 27 जनवरी 1988 से लेकर 19 फरवरी 1988 तक के वो 25 दिन शायद ही कोई मेरठ वासी भूल पाया हो। किसानों की समस्याओं को लेकर कमिश्नरी के समीप सीडीए ग्राउंड में भाकियू राष्ट्रीय अध्यक्ष चौधरी महेन्द्र सिंह टिकैत के नेतृत्व में उनकी फौज धूल उड़ाती हुई आ गयी। देखते-देखते कमिश्नर के आसपास ही नहीं सीडीए का मैदान भाकियू के आन्दोलन में तब्दील हो गया। लाखों की संख्या में आये इन किसानों के आन्दोलन की आग के शोले लखनऊ में भड़के। उनके आन्दोलन को कुचलने के लिए तत्कालीन कमिश्नर वीके दीवान ने मुख्यमंत्री वीरबहादुर सिंह से बात करके 20 कंपनी पीएसी, 11 कंपनी सीआरपीएफ लगाई। आन्दोलनकारियों को रोकने के लिए मेरठ-मुजफ्फरनगर मार्ग पर लगातार फ्लैग मार्च भी कराया। इस आन्दोलन के दौरान ठंड अधिक होने के कारण सात किसानों की ठंड से मौत भी हुई पर किसानों ने धैर्य नहीं छोड़ा और हक के लिए लड़ाई लड़ते रहे। सैकड़ों भट्ठियां यहां चढ़ी। सैकड़ों गांव से इतनी खाद्यान्न सामग्री यहां आती थी कि आसपास गांव के लोग ही नहीं शहरी भी यहां खाना खाते थे। वीररस के सुप्रसिद्ध कवि हरिओम पंवार काव्य पाठ करके आन्दोलनकारियों में जुनून पैदा करते थे तो करनाल की भूरो, शांति व किशनी यहां भजन सुनाती थी। उस वक्त फोर्स नहीं किसानों ने स्वयं ही यातायात व्यवस्था का संचालन किया। किसी की हिम्मत इस आन्दोलन दौरान धरनास्थल की ओर वाहन ले जाने की नहीं होती थी।यह एक ऐसा मंजर था जो न किसी ने देखा था और न शायद देखने को मिले। शहर के लोगों के लिए हैरत में डालने वाले क्षण थे। क्या ऐसा किसान आंदोलन होता है, क्या ऐसे अपनी मांगें मनवायी जाती हैं, क्या ऐसे सरकार को झुकाया जाता है, ऐसे तमाम सवाल लोगों की जबान पर थे। टिकैत की एक झलक और उनकी ठेठ भाषा भी बहुत लुभाती थी। आंदोलन के 24 दिन बाद प्रदेश सरकार की ओर से मंत्री सईदुल हसन व हुकुम सिंह ने किसानों के बीच आकर उनसे वार्ता की। इस तरह यहां धरना तो समाप्त हो गया पर टिकैत ने प्रदेश सरकार के खिलाफ असहयोग आन्दोलन चलाने की घोषणा कर दी। इसी दौरान उन्होंने किसानों से अपील की थी कि वह बिजली के बिल न दें। किसी भी सरकारी अधिकारी को गांव में न घुसने दें। इसका असर हर गांव में हुआ। मेरठ के इस ऐतिहासिक आंदोलन के बाद किसान इतने मजबूत हो गए कि विभिन्न महकमों के अफसर गांवों में जाने से कतराने लगे। इस आंदोलन से ही टिकैत किसानों के मसीहा बने और देश दुनिया में नाम बुलंद हुआ। मेरठ के लोगों के जहन में आज भी आंदोलन की याद ताजा है। बहरहाल, टिकैत के दुनिया से चले जाने से सब गमजदा हैं। यही आंदोलन था जिसके बाद टिकैत ने 25 अक्टूबर 1988 को नई दिल्ली स्थित वोट क्लब पर आन्दोलन का बिगुल फूंका।

किसान आंदोलन
चौधरी चरण सिंह के बाद अगर किसी ने किसानों की असल समस्या समझी और उसके लिए आगे आकर संवेदनहीन तंत्र से जूझकर किसानों के हक की लड़ाई लड़ी तो वे चौधरी टिकैत ही थे। उनके जाने के बाद किसानों को अपने हक के लिए आंदोलन का रास्ता दिखाने वाला दूर-दूर तक कोई निस्वार्थी नेता नजर नहीं आता है। उनके जाने से किसान आंदोलन को गहरा झटका लगा है। विडंबना है कि सरकार तेल कंपनियों का घाटा पाटने के लिए तेल के दाम तो नौ महीनों में नौ बार बढ़ा देती है, लेकिन कथित विकास कायरें की भेंट चढ़ती किसानों की कृषियोग्य भूमि और किसानों के उपज की वाजिब कीमत देने-दिलाने की चिंता की पहल कहीं से नहीं हो रही है। ऐसे ही मुद्दे और सवाल टिकैत के आंदोलन की नींव बनते रहे। 1987 में बिजली की बढ़ी दरों के खिलाफ खेड़ीकरमू पावर हाउस पर टिकैत के किए गए आंदोलन ने उनकी पहचान राष्ट्रीय स्तर पर पुख्ता की और इस आंदोलन का ही असर था कि सरकार को उनके आगे झुकना पड़ा। तत्कालनी मुख्यमंत्री वीरबहादुर सिंह को सिसौली आकर किसानों की पंचायत को संबोधित कर उनकी मांगें माननी पड़ी। ये था टिकैत की गर्जना का असर। इसके बाद तो टिकैत की आवाज जब-जब गूंजी, सरकारें कांप गईं। देखते ही देखते वे किसान से भगवान बन गए और उनका पैतृक गांव सिसौली किसानों का तीर्थस्थल। पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह के निधन के बाद टिकैत ने सफलतापूर्वक किसान आंदोलन की बागडोर अपने हाथों में ली और 17 अक्तूबर 1986 को गैर राजनीतिक संगठन भारतीय किसान यूनियन की स्थापना कर किसानों की जुझारू वृत्ति को धार दी। उनके खाते में 1990 में जनता दल सरकार के खिलाफ प्रदर्शन, लखनऊ पंचायत का आयोजन एवं सात सूत्री मांग को लागू करने के लिए आंदोलन, गाजियाबाद के किसानों को मुआवजा दिलाने के लिए प्रदर्शन, चिनहट काथुआटा के किसानों की अधिग्रहीत भूमि के पर्याप्त मुआवजे के लिए आंदोलन जैसी असाधारण सफलताएं शामिल हैं। उन्होंने कई बार विश्र्व व्यापार संगठन और सरकार की कृषि नीति में किसानों के साथ नाइंसाफी के विरोध का भी बिगुल फूंका। दुखद है कि आज के किसान की कद्र देश की शक्ति और सामर्थ्य का अहसास कराने वाले जय जवान-जय किसान के नारे में कैद होकर रह गई है, इसकी मुक्ति का संग्राम छेड़ने वाले टिकैत अब नहीं रहे।

गिरफ्तार व रिहा
15 जुलाई 1990 लखनऊ पचायत में जाते हुए पहली बार चौ. टिकैत बरेली में गिरफ्तार किए गए।
•31 दिसंबर 1991 लखनऊ पंचायत में जाते हुए मेरठ में गिरफ्तार हुए।
•22 जून 1992 लखनऊ पंचायत में जाते फैजाबाद में गिरफ्तार किए गए।
•31 जुलाई 1992 गाजियाबाद पंचायतमें जाते हुए मोदीनगर में गिरफ्तार हुए।
•23 सितंबर 1992 रामकोला पंचायत में जाते हुए रामकोला में गिरफ्तार हुए।
•7 अकटूबर 1992 सिकंदराबाद पंचायत में जाते हुए अलीगढ़ में गिरफ्तार किए गए।
•14 दिसम्बर 1997 मुजफ्फरनगर में रेल रोको आंदोलन करते हुए गिरफ्तार किए गए।
•12 फरवरी 2000 लखनऊ पंचायत में जाते हुए मुरादाबाद में गिरफ्तार हुए।
•13 मार्च 2000 लखनऊ पंचायत में जाते हुए रामपुर में गिरफ्तार किए गए।
•12 जनवरी 2001 हरिद्वार मुद्दे पर आंदोलन के दौरान बुलंदशहर में गिरफ्तार किए गए।
•19 फरवरी 2001 कृषि उतपाद के आयात के विरोध में मुंबई के आजाद मैदान में गिरफ्तार।
•19 मार्च 2001 कृषि को विश्व व्यापार संगठन से बाहर करने की मांग को लेकर किसान घाट पर गिरफ्तार।
•16 सितंबर 2002 लखनऊ किसान महापंचायत में जाते हुए रामपुर में गिरफ्तार।
•6 अक्टूबर 2002 लखनऊ विधान सभा के सामने गिरफ्तार।
•13 दिसंबर 2002 पांवटा साहिब (हिमाचल प्रदेश) में किसान पंचायत में गिरफ्तार व रिहा।
•15 दिसंबर 2002 बस्ती जाते समय रामपुर में गिरफ्तार।
•2 सितंबर 2004 मुंबई आजाद मैदान में एक लाख किसानों के साथ गिरफ्तार।
•20 नवंबर 2007 बागपत में आपराधिक मामले में टिकैत को समर्पण करने के बाद जेल भेजा।
•3 सितंबर 2009 को जंतर-मंतर पर किसानों के साथ गिरफ्तार।

भाकियू की संघर्ष गाथा
•27 जनवरी 1987 से 30 जनवरी 1987 तक करमूखेड़ी (मुजफ्फरनगर) बिजलीघर पर 4 दिवसीय धरना।
•27 दिसंबर 1987 से 19 फरवरी 1988 तक कमिश्नरी मेरठ पर 35 सूत्रीय मांगों को लेकर 44 दिवसीय धरना।
•6 मार्च 1988 से 23 जून 1988 तक रजबपुर (मुरादाबाद) में 110 दिवसीय धरना एवं रेल रोको अभियान।
•25 अक्टूबर 1988 से 31 अक्टूबर 1988 तक नई दिल्ली वोट क्लब पर 7 दिवसीय धरना।
•3 अगस्त 1989 से 10 सितंबर 1989 तक गंग नहर के किनारे कस्बे भोपा में नईमा काण्ड पर 39 दिवसीय धरना।
•2 अक्टूबर 1989 को देश के कई किसान संगठनों के साथ दिल्ली के वोट क्लब पर धरना।
•14 जुलाई 1990 से 22 जुलाई 1990 तक लखनऊ (उत्तर प्रदेश) में 9 दिवसीय धरना।
•2 अक्टूबर 1991 को नई दिल्ली में खाद की सब्सिडी एवं अन्य समस्याओं को लेकर धरना। 31 दिसंबर 1991 से 17 जनवरी 1992 तक लखनऊ (उत्तर प्रदेश) में किसानों की मांगों (मुख्यत बिजली एवं खाद के बढ़े मूल्य) को लेकर 18 दिवसीय धरना।
•3 मार्च 1993 से 4 मार्च 1993 तक नई दिल्ली में डन्कल प्रस्ताव एवं बीज सत्याग्रह को लेकर 2 दिवसीय धरना।
•2 जून 1992 से 3 जुलाई 1992 तक लखनऊ में किसानों की 7 सूत्रीय मांगों (मुख्यत दस हजार रुपये का कर्जा माफी) को लेकर धरना।
•2 जून 1992 से 17 अगस्त 1992 तक गाजियाबाद में किसानों की भूमि अधिकरण व अन्य मुद्दों को लेकर 77 दिवसीय धरना।
•4 फरवरी 1993 से 6 फरवरी 1993 तक चौ. टिकैत की लखनऊ बाराबंकी, सुल्तानपुर, जौनपुर, मऊ, बलिया और गोरखपुर सहित अनेक जनपदों में किसान पंचायतें।
13 किसानों की भूमिअधिग्रहण व गिरफ्तार किसानों की रिहाई की मांगों को लेकर 4 दिवसीय धरना।
•26 सितंबर 1993 से 4 अक्टूबर 1993 तक समस्त उत्तर प्रदेश में किसानों की 7 सूत्रीय मांगों (मुख्यत रामकोला के किसानों पर गोली काण्ड, गन्ने का भुगतान तथा 10 हजार रुपये के कर्जे माफी जैसे मुद्दे को लेकर नौ दिवसीय धरना)।
•17 सितंबर 1993 से 19 सितंबर 1993 तक नई दिल्ली में किसानों की मांगों को लेकर (डन्कल प्रस्ताव एवं बीज सत्याग्रह सहित) 3 दिवसीय धरना।
•16 अगस्त 1995 को उप्र के मुख्यमंत्री सुश्री मायावती से लखनऊ में चौ. टिकैत की वार्ता।
•17 सितंबर 1995 को उप्र की राजधानी लखनऊ में किसान महापंचायत।
•7 मार्च 1996 को किसान घाट पर देश बचाओ किसान बचाओ महापंचायत आयोजित की गई, जिसमें उत्तर भारत के राज्यों के लगभग दो लाख किसानों ने हिस्सा लिया। 17 फरवरी 1999 को उप्र की प्रत्येक तहसील पर किसान प्रदर्शन की घोषणा।
•9 मार्च 1999 को भाकियू में अन्दरुनी विवादों व किसानों का पूर्ण सहयोग न मिलने पर टिकैत द्वारा यूनियन को भंग करने की घोषणा। मुख्यालय सिसौली में किसानों की यूनियन को पुन: संगठित करने के दबाव के कारण पुन : संगठित करने की घोषणा की गई।
•13 अक्टूबर 1999 को बाराबंकी में किसान महापंचायत में सरकार की किसान विरोधी नीतियों के खिलाफ असहयोग आंदोलन जारी रखने की घोषणा।
•29 अक्टूबर 1999 को विश्व व्यापार संगठन के खिलाफ एवं कृषि उपज का लाभकारी समर्थन मूल्य देने की मांग को लेकर नई दिल्ली जंतर मंतर पर एक दिवसीय धरना।
•13 फरवरी 2000 को लखनऊ के बेगम हजरत पार्क में किसान महापंचायत।
•17 मार्च 2000 को अमेरिकी राष्ट्रपति श्री बिल क्लिंटन के भारत आने पर उनके नाम विश्व व्यापार संगठन के कारण भारत के किसानों को होने वाले नुकसान के संबंध में भारत के प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी को एक ज्ञापन दिया।
•25 मार्च 2000 को उप्र के मुख्यमंत्री रामप्रसाद गुप्त से चौ. टिकैत की वार्ता।
•5 सितंबर 2000 को दक्षिणी एशिया के किसानों का एक सम्मेलन नई दिल्ली में संपन्न हुआ जिसमें विश्व व्यापार संगठन द्वारा किसानों के शोषण, विकासशील देशों की कृषि की व्यवस्था को नष्ट करने की साजिश का मुकाबला करने के लिये 10 सूत्रीय प्रस्ताव पारित किया गया।
•26 सितंबर 2000 को नई दिल्ली में राष्ट्रपति को विश्व व्यापार संगठन से कृषि को बाहर करने के संबंध में एक ज्ञापन दिया।
29 दिसंबर 2000 को किसान विरोधी केंद्र सरकार की नीतियों के विरोध में किसान घाट से संसद घेराव आंदोलन।
•3 नवंबर 2001 को उप्र के गन्ना उत्पादक किसानों की बरबादी एवं कृषि को विश्व व्यापार संगठन से बाहर रखने के लिये संसद मार्ग नई दिल्ली में प्रदर्शन किया।
•8 नवंबर 2002 को उप्र की चीनी मिल चलाने के लिए मंसूरपुर रेलवे ट्रेक एक दिन के लिए बंद किया और अगले दिन से पशुओं के साथ जेल भरो आंदोलन की घोषणा।
•8 अप्रैल 2008 को उत्तर प्रदेश सरकार के खिलाफ लखनऊ में किसान महापंचायत।
•चौ. टिकैत बिजनौर की एक रैली में मायावती पर टिप्पणी को लेकर हुए हंगामे के बाद 2 अप्रैल 2008 को अदालत में पेश हुए। इसको लेकर कई दिनों तक सिसौली का सुरक्षा बलों ने घेराव भी किया।
•27 अक्तूबर 2009 को बरेली एसीजेएम कोर्ट में पेश होकर 23 मार्च 1992 को बरेली जंक्शन पर ट्रेन में की गई तोड़फोड़ के मामले में जमानत करानी पड़ी।
•मार्च 2010 में दिल्ली जंतर-मंतर पर गिरफ्तारी और बाद में रिहा।पर आंदोलन के दौरान बुलंदशहर में गिरफ्तार किए गए।
•19 फरवरी 2001 कृषि उतपाद के आयात के विरोध में मुंबई के आजाद मैदान में गिरफ्तार।
• 19 मार्च 2001 कृषि को विश्व व्यापार संगठन से बाहर करने की मांग को लेकर किसान घाट पर गिरफ्तार।
•16 सितंबर 2002 लखनऊ किसान महापंचायत में जाते हुए रामपुर में गिरफ्तार।
•16 अक्टूबर 2002 लखनऊ विधान सभा के सामने गिरफ्तार। 13 दिसंबर 2002 पांवटा साहिब (हिमाचल प्रदेश) में किसान पंचायत में गिरफ्तार व रिहा।
•15 दिसंबर 2002 बस्ती जाते समय रामपुर में गिरफ्तार।
•2 सितंबर 2004 मुंबई आजाद मैदान में एक लाख किसानों के साथ गिरफ्तार।
•20 नवंबर 2007 बागपत में आपराधिक मामले में टिकैत को समर्पण करने के बाद जेल भेजा।
•3 सितंबर 2009 को जंतर-मंतर पर किसानों के साथ गिरफ्तार

बड़ी सफलता
इन आंदोलनों में मिली बड़ी सफलता खेड़ी करमू आंदोलन किसानों द्वारा बिजली की दरों में वृद्धि को लेकर आंदोलन के दबाव में तत्कालीन भारत के प्रधानमंत्री राजीव गांधी द्वारा उत्तर प्रदेश के सांसदों की बैठक में बिजली दर 30 रुपये से पुन: 20.50 रुपये किए जाने की घोषणा की। नइमा कांड भोपा गंगनहर पर नइमा कांड को लेकर चलाए गए आंदोलन में सरकार के प्रतिनिधि चौधरी नरेंद्र सिंह ऊर्जा मंत्री एवं भाकियू प्रतिनिधियों के बीच दस सितंबर 1989 को लिखित समझौता हुआ, जिसमें किसानों को ग्यारह महीने के बिजली के बिल माफ किए गए तथा किसानों के क्षतिग्रस्त टै्रक्टर नए दिए गए। नइमा के परिजनों को आर्थिक सहायता चैक भी सौंपा गया। सिसौली किसान पंचायत 11 दिसंबर 1990 को भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री स्वर्गीय चंद्रशेखर एवं उप प्रधानमंत्री चौधरी देवीलाल व उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव ने सिसौली किसान पंचायत में किसानों के 21 माह के बिजली के बिल माफ करने की घोषणा की। 9 अगस्त 1986 भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री एचडी देवगौड़ा एवं उत्तर प्रदेश के गवर्नर रमेश भंडारी ने विद्युत दरों में दस रुपये की कटौती, पेनल्टी की छूट एवं कृषि यंत्रों पर ऋण लेने में स्टांप में कटौती व चोगामा नहर परियोजना को स्वीकृत करने की घोषणा की। 12 सितंबर 2007 भारत के प्रधानमंत्री डा.मनमोहन सिंह से उनके आवास पर बैठक हुई। रात में ही गेहूं के समर्थन मूल्य में 400 रुपये कुंतल की बढ़ोतरी की घोषणा करते हुए गेहूं का मूल्य 1050 रुपये घोषित किया गया।



एक अप्रैल 2008 की रात
30 मार्च को बिजनौर में रैली के दौरान सूबे की मुखिया मायावती के खिलाफ टिप्पणी कर बाबा टिकैत भाकियू की राजधानी सिसौली पहुंच चुके थे। गहमा-गहमी में 31 मार्च का पूरा दिन बीत गया। एक अप्रैल को बाबा की गिरफ्तारी के फरमान के बाबत सुनते ही हर युवा-बुजुर्ग आक्रोशित हो गया। रात के वक्त सिसौली तक पहुंचने वाले हर रास्ते पर भाकियू के सिपेहसालार तैनात थे। बाबा टिकैत जिंदाबाद के नारों से सिसौली गूंज रहा था। गांव की हर गली में बुग्गियां उल्टी पड़ी थीं, टै्रक्टर-ट्राली सड़कों के मुहाने पर खड़ी थीं। सिसौलीवासियों ने छतों पर ईट-रोड़े और बोतलें चढ़ा रखी थीं। लोग चौबारों पर चढ़कर गांव की हद पर नजर रखे थे। जैसे ही गांव की सीमा पर कोई लाइट दिखाई देती तुरंत संपर्क शुरू हो जाता। वाकई, बाबा के पसीने की जगह खून बहाने का जज्बा लिए तिलिस्म रचा गया था। जैसे-जैसे रात आगे बढ़ी बाबा भी अपने रंग में आते गए। चौधरी टिकैत भोर में ही पशुओं के पास चले गए। हाथ फिराते रहे। एकाएक मीडिया ने घेर लिया और सीएम के प्रति टिप्पणी के बाबत पूछने लगे। बाबा ने बेबाकी से अफसोस जाहिर करते हुए कहा कि रावण था, चौंसठ विद्याओं का ज्ञाता था। सीता का हरण करके ले गया। बुद्धि फिरगी थी। मैं तो मानस हूं। अर, मायावती तो म्हारी बेट्टी जैसी। अर जो कुछ गलत-सलत लिकड़ गया मुंह सै तो माफी मांगू। कौण-से का भाई? किसान भवन में आने वाले हर उस शख्स से जिससे बाबा अनजान थे, यही पूछते कि कौण-से का भाई? आगंतुक से उनके इस सवाल का मतलब सीधा-सा है कि यह पता चल सके कि वह किस गांव का है या किस परिवार से ताल्लुक रखता है? तम्हीं कह लो, मैं बैठरा बाबा को देखते ही भीड़ का उत्साह कई गुना बढ़ा होता था। बाबा के अभिवादन में भीड़ जब शोर मचाती तो बाबा पुचकार मिश्रित फटकार में कहते कि तम्हीं कह लो, मैं बैठरा।



दर्ज हुए मुकदमे
मुख्यमंत्री मायावती भी टिकैत पर अंतिम समय में मेहरबान हो गई थीं। उनके विरुद्ध विभिन्न जनपदों में चल रहे 13 मुकदमों को वापस लेने के लिए प्रमुख सचिव गृह कुंवर फतेहबहादुर सिंह व प्रमुख सचिव न्याय अमर सिंह की ओर से टिकैत को पत्र भेजे गए। हालांकि भाकियू अध्यक्ष की ओर से इन पत्रों का कोई जबाव नहीं दिया गया। भाकियू अध्यक्ष स्वर्गीय टिकैत के खिलाफ पूरे आन्दोलन के दौरान 77 मुकदमे दर्ज हुए। 13 मुकदमों को छोड़कर सभी निस्तारित हो चुके हैं। बिजनौर में एक सभा दौरान उन्होंने बसपा राष्ट्रीय अध्यक्ष मायावती पर टिप्पणी की तो उनके विरुद्ध दलित एक्ट में मुकदमा दर्ज हुआ। दो अप्रैल 2008 को वह इस मामले में बिजनौर कोर्ट में भी पेश हुए। 27 जनवरी 2003 को मुजफ्फरनगर में टिकैत पर पुलिस ने लाठीचार्ज किया। काकड़ा गांव में इस मामले को लेकर विरोध प्रदर्शन हुआ, जिसमें एसडीएम डीपी श्रीवास्तव को गंभीर चोट आयी और डीएम बाल-बाल बचे। एक फरवरी को मायावती सरकार के विरोध मुजफ्फरनगर में जनसभा हुई जिसमें पुलिस-प्रशासन की सभा स्थल पर जाने की हिम्मत तक नहीं। इस मामले में तीन मुकदमे दर्ज हुए। इस तरह उनके विरुद्ध 13 मुकदमे विचाराधीन हैं, जिन्हें वापस लेने की कवायद सरकार ने की है।

दो स्थानों पर विसर्जित हुई थी अस्थियां
भारतीय किसान यूनियन के दिवंगत राष्ट्रीय अध्यक्ष चौधरी महेंद्र सिंह टिकैत की अस्थियां 18 मई 2011, बुधवार को पूरे विधिविधान और कर्मकांड के साथ गंगा में दो स्थानों ब्रंाकुंड और किसान घाट पर विसर्जित कर दी गईं। दिवंगत महेन्द्र सिंह टिकैत की अस्थि कलश यात्रा उनके पैतृक गांव सिसौली से चलकर उप्र के मुजफ्फरनगर, छमार, पुरकाजी आदि जगहों से होते हुए हरिद्वार पहुंची। यात्रा में पांच सौ से अधिक गाडि़यों का काफिला साथ चल रहा था। इसके अलावा बड़ी संख्या में उनके समर्थक किसान सुबह से ही हरिद्वार पहुंचकर हरकी पैड़ी पर डेरा डाले हुए थे। अस्थि कलश यात्रा के सबसे आगे चल वाहन पर दिवंगत टिकैत के चार अ स्थि कलशों को रखा गया था, जिसके दर्शन करने के लिए सड़कों पर मौजूद किसानों का रेला जगह-जगह पर श्रृद्धांजलि दे रहा था।
समाप्त

Thursday, April 4, 2019

दहेज ना लेने पर चौ0 गजेन्द्र अहलावत सम्मानित

जहॉ पर आज समाज मे दहेज रूपी राक्षस लगातार अपने पैर पसार रहा है। वही पर कुछ लोग एसं भी है। जो दहेज रूपी राक्षस को जड से उखाडकर फैकने के लिये कमर कस चुके है। ऐसे ही चौधरी गजेन्द्र सिंह अहलावत है। जो अहलावत खाप का प्रतिनिधित्व भी करते है। चौधरी गजेन्द्र सिंह अहलावत के पास एक बेटा है। जो इन्जिनियर है। जब बेटे का रिस्ता लडकी वालो की और से आया तो चौधरी गजेन्द्र सिंह ने एक ही बात कही की की मेरे बेटे का रिस्ता तभी पक्का माना जायेगा , यदि आप यह शादी बिना दहेज के करे । लडकी वाले भी चौधरी गजेन्द्र सिंह अहलावत की बात सुनकर आश्चर्यचकित थे कि हो क्या रहा है। शादी की सामाजिक रस्म  मे जहॉ भी कुछ देने की बात आती तो चौधरी गजेन्द्र सिंह लडकी वालो से केवल 1 रू0 रखने को कहते । 08 फरवरी 2019 को चौधरी गजेन्द्र सिंह अहलावत ने अपने  इन्जिनियर बेटे की शादी  पूर्ण रूप् से  बिना दहेज के की जो क्षेत्र मे एक मिशाल बनी थी । चौधरी गजेन्द्र सिंह 04-04-2019 को चौधरीत् कबूल सिंह की पुन्य तिथि पर आये हुये थे , वही पर उन्हे पूर्ण रूप् से दहेज ना लेकर अपने बेटे की शादी को करने के कारण सर्व खाप की और से सम्मानित किया गया इस मौके पर कई लोगो ने अपने बच्चो का विवाह भविष्य मे बिना दहेज के करने की बात की और संकल्प लिया । इस मौके पर चौधरी सुभाष बालियान (सर्व खाप मन्त्री ) चौधरी अजित सिंह (रालोद अध्यक्ष) , चौधरी नरेश टिकैत (भारतीय युनियन अध्यक्ष) व सभी खाप के चौधरी मौजूद रहे ।

रविन्द्र शामली
कुस्ती जगत

Saturday, March 30, 2019

गुरू भीम पहलवान पर विशेष



गुरू भीम पहलवान की कर्म भूमि किशन गढ महरोल्ली 

दिल्ली के किशन गढ महरोल्ली मे सन् 1951 को भीम पहलवान का जन्म हुआ था। इनके पिता का नाम रतन सिंह पहलवान और माता का नाम रामदेई था । जब भीम पहलवान जी का जन्म हुआ तब उनके डील डोल को देखकर ही पिता रतन सिंह ने अपने बेटे का नाम भीम रखने का फैसला किया था । रतन सिंह भी अपने समय के एक प्रतिष्ठित पहलवान रहे है। रतन सिंह के बेटे भीम ने अपने नाम के अनुरूप कार्य किया एक तरह से कह सकते है। जैसा नाम वैसा काम,



भीम जी की नशो मे कुस्ती बचपन से ही कूट- कूट कर भरी पडी थी 

श्री भीम जी की नशो मे कुस्ती बचपन से ही कूट- कूट कर भरी पडी थी । तथा भारत केसरी , हिन्द केसरी के साथ अनेको प्रतिस्पर्धाओ मे मेडल जीतकर अपना लोहा मनवाया । पहलवान भीम जी को उनके जानने वाले उन्हे आज भी कुस्ती का दिवाना कहते है।  पहलवान जी ने दिल्ली टूरीज्म डपलामेन्ट कारपोरेशन मे नौकरी की लेकिन कुस्ती के लिये समय निकालना कभी ना भूले लगातार कुस्ती के प्रति अटूट लगाव के कारण ही पहलवान भीम जी ने 1968 मे दिल्ली देहात बाल व्यायामशाला की स्थापना की और बच्चो को कुस्ती सिखाने लगे  ।


भीम पहलवान की बडे दंगलो मे होती थी बडी भुमिका

भीम पहलवान वो पहलवान थे जिनहोने खेल को बहुत कुछ दिया उन्होने बहुत संघर्ष खेल को  आगे बढाने के लिये किया जीवन के आखिरी दौर तक वह संघर्ष जारी रहा बडे दंगलो मे पहलवान जी की बडी भूमिका लम्बे समय तक चलती रही उन्होने अनेको भरत केसरी , हिन्द केसरी दंगलो का आयोजन कराया और अनेको दंगलो मे समय समय पर सहयोग करते रहे । अपने इन्ही कार्यो की बदौलत भीम पहलवान को आज भी याद किया जाता है।

भीम पहलवान को जीव जनतुओ से था अटूट लगाव

 भीम पहलवान को जीव जनतुओ से अटूट लगाव रहा पहलवान जी जब अखाडे मे होते तो कई सारे कुत्ते बिल्ली कौवे तक अखाडे  मे  आ जाते थे , पहलवान जी उन्हे दूध पिलाया करते । ये प्राणी उनकी गाडी तक पहचान लेते थे और गाडी के पीछे दौड पडते पहलवान जी कई बार तो इन्हे  अपनी गाडी मे बैठा लेते थे ।

कमेंट्री के बादशाह थे भीम पहलवान 

कुस्ती के दंगलो मे भीम पहलवान जी कमेंट्री भी किया करते थे , उनका बोलने का ढंग इतना प्राभावी था कि क्या कहने आज भी कई लोग भीम पहलवान को याद कर कहते है। कि पहलवान जी  जैसी कमेंट्री आज तक सुनने को नही मिली


कुस्ती के दीवाने थे भीम पहलवान 

भीम पहलवान जी कुस्ती से जुडे कार्यो को करने मे अपने निजि कार्यो को भी छोड देते थे । उनकी लग्नशीलता को देखकर उनके करीबी भीम पहलवान जी को कुस्ती का दीवाना कहते थे । क्योकि कई बार तो पहलवान जी अपनी सारी तनखा को पहलवानो पर ही खर्च कर देते थे ।

श्री भीम पहलवान की पत्नी श्रीमति सरस्वती महलावत को करीब से  जानिये

श्रीमति सरस्वती महलावत का जन्म दिल्ली के ही सहीपुर गॉव मे सन् 1955 मे हुआ था । पिता उमराव सिंह व मॉ चन्द्रावती के लाड प्यार से पली बडी हुई सरस्वती  का जैसा नाम वैसा ही काम भी रहा ।  सरस्वती जी बचपन से ही पढाई लिखाई मे बेहद होनहार थी । उनकी पढाई और ज्ञान कौशल के चलते होम मिनिस्टरी मे नौकरी मिली बाद मे वे टीचिगं लाईन मे आ गई और महामहिम राष्ट्रपति द्वारा सर्वश्रेष्ट टीचर के अवार्ड से सम्मानित किया गया। यहॉ तक तो ठीक था लेकिन जब जरूरत पडी तो कुस्ती के क्षेत्र मे अपने आप को उन्होने बखुबी स्थापित ही नही किया बल्की अपने पति  की विरासत को आगे बढाने के लिये लगातार संघर्ष भी किया जो आज तक जारी है। सरस्वती जी बताती है कि अभी हमारे पास मे 50 बाई 50 फिट मिट्टी का अखाडा है। उसी मे पहलवान ट्रेनिगं लेते है तथा बडे दंगल का आयोजन हम बहुत पहले से ही करते आ रहे है। अब बेटे मोहित के कन्धो पर जिम्मेदारी है। जिसे वो बखूबी निभा रहा है।


1981मे बन्धे शादी के बन्धन मे 

1981 मे पहलवान भीम जी की शादी सरस्वती महलावत के साथ हुई । सरस्वती महलावत जी होम मिनिस्टरी मे नौकरी करती थी । उस समय सरस्वती महलावत जी के पास M.A MED , कमर्शियल आर्ट डिग्री के अलावा कई डिग्रीया थी । सरस्वती जी ने बाद मे होम मिनिस्टरी की नौकरी छोडकर टीचिगं लाईन की नौकरी सुरू की पहलवान भीम जी के साथ रहते - रहते कब सरस्वती जी को कुस्ती से लगाव हो गया उन्हे पता ही ना चला । भीम पहलवान जी को कुस्ती से इतना लगाव था कि अपनी सारी तनखा कई बार वे अपने पहलवानो पर ही खर्च कर देते थे । सरस्वती जी पुराने दिनो को याद कर बताती है कि मै कई बार सोचती थी की पहलवान जी को कुस्ती के प्रति कितना लगाव है। वे कई बार घर परिवार के कार्यो को छोड कुस्ती के कार्यो को महत्व देते थे । सरस्वती जी आगे कहती है कि मैने भी पहलवान जी की भावनाओ को समझने मे देर ना लगाई और उनके कार्यो मे अपना हाथ बटाने लगी मैने उनके कार्यो का कभी विरोध नही किया ।


भीम पहलवान जी को दो बेटे हुये रोहित और मोहित , लेकिन पहलवान जी की इच्छा थी की एक बेटी भी हो पहलवान जी के घर मे एक बेटी का जन्म भी हुआ । भीम पहलवान जी अपनी बेटी को बेटो से भी ज्यादा दुलार करते थे । बेटी का नाम रचिता रखा लेकिन घर मे प्यार से भावना नाम लेकर पहलवान जी अपनी बेटी को पुकारा करते थे । भीम पहलवान जी के बेटे रोहित का स्वर्गवास हो चुका है।



मोहित खुद का बिजनेश करता है। और बेटी रचिता डॉक्टर है। साल 2000 मे वो घटना घटी जो नही घटनी चाहिये थी । भीम पहलवान जी का एक ऐक्सीडेन्ट मे स्वर्गवास हो गया था।  भीम पहलवान जी की पत्नी श्रीमती सरस्वती महलावत जी के लिये यह घटना बहुत बडे दुख के पहाड के समान थी। इसके बाद सरस्वती महलावत जी ने अपने आप को सम्भाला और अपने पति की जो आधी अधुरी पडी योजनाये थी उनमे  जान फूकने का काम किया । कुछ ही समय के बाद मे जिस पृष्ठ भूमि पर भीम पहलवान जी काम किया करते थे उसी पृष्ठ भूमि पर आकर श्रीमती सरस्वती महलावत जी ने कार्य करना सुरू कर दिया ।

श्रीमती सरस्वती महलावत जी ने अखाडे की बागडोर सम्भाली 

अपने पति के अखाडे की बागडोर को भी अपने हाथो मे ले संचालन करना सुरू कर दिया । श्रीमती सरस्वती महलावत जी देश की एक मात्र एसी महिला है जो कुस्ती के क्षेत्र मे वो योगदान दे रही है।  जिस योगदान की बुनियाद पर श्रीमति सरस्वती जी करोडो महिलाओ और पुरूषो के लिये प्रेरणा का र्श्रोत बन चुकी है। श्रीमती सरस्वती महलावत जी दिल्ली देहात बाल व्यायामशाला की संचालिका रहते हुये अखाडे को नई उचाईयॉ देने मे कभी पीछे नही हटी और समाज व देश के सामने श्रीमती सरस्वती महलावत ने अपने आप को कई क्षेत्रो मे साबित किया  । जिसे कभी नकारा नही जा सकता है।
                                          अखाडें मे श्री मोहित भीम पहलवान (किगं)

दिल्ली देहात बाल व्यायामशाला के वर्तमान संचालक है, श्री मोहित भीम पहलवान (किगं)

पहलवान भीम जी का लडका मोहित किंग भी अखाडे को अपनी सेवाये देता है। अखाडें पिता के बताये रास्ते पर चलकर मोहित अपने अखाडे को नई  दिशा देने का कार्य कर रहे है। ताकि अपनी विरासत को सहेजकर रखा जा सके , इस विरासत को यहा तक एक जो मंजिल मिली  है। उसमे गुरू भीम पहलवान जी जिन्हें कुस्ती रत्न के नाम से भी जाना जाता है। उनका बडा योगदान रहा है।


श्री मोहित भीम पहलवान (किगं)का समर्पण भाव

कई कुस्ती के प्रति समर्पण भाव ही तो  हैं , कि मोहित भीम पहलवान (संचालक दिल्ली देहात बाल व्यामशाला ) अपने अखाडे के कई बच्चो का खर्च तक उठाते है। इसके लिये मोहित  भीम पहलवान उन बच्चो को चुनते है। जो रोजाना अखाडे मे अभ्यास करते है। गैर हाजिर नही रहते । इससे बच्चो मे प्रतिस्पर्धा बढती है।


श्री मोहित भीम पहलवान (किगं)का दंगलो मे रहता है विशेष सहयोग 

दिल्ली के दंगलो से मोहित भीम पहलवान किंग का पुराना नाता  रहा है। आज भी दंगलो मे गुरू भीम पहलवान की तर्ज पर मोहित पहलवान जी का सहयोग रहता है। मोहित भीम पहलवान कहते है। कि हम तो खेल के लिये तन मन धन से मेहनत करते है। फल की इच्छा नही करते ।


श्री मोहित भीम पहलवान (किगं) से जुडी कुछ बाते 

श्री मोहित भीम पहलवान (किगं ) का जन्म  14-11-1986 को दिल्ली मे हुआ था । पिता भीम पहलवान और माता श्रीमती सरस्वती देवी ने श्री मोहित भीम पहलवान (किगं )  को उच्च संस्कार देने मे कोई कमी नही छोडी , यही कारण है की श्री मोहित भीम पहलवान (किगं )  के अन्दर समाज सेवा की भावना कूट कूट कर भरी है। मोहित की बहन का कहना है कि मोहित जैसा भाई  ढूढने से नही किस्मत से मिलता है। श्री मोहित भीम पहलवान (किगं )  ने अपनी मेहनत और अपने उच्च कार्यो की बदौलत समाज मे एक नई  पहचान बनाई है। साल 2009 मे श्री मोहित भीम पहलवान (किगं )  की शादी हो चुकी है।  श्री मोहित भीम पहलवान (किगं )  बजरंग बली के भक्त है। दिल्ली देहात बाल व्यायामशाला अखाडे के संचालन के अलावा समाज सेवा मे श्री मोहित भीम पहलवान (किगं )जी सदा समर्पित रहते है।


रविन्द्र शामली
कुस्ती जगत

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Saturday, March 16, 2019

श्री राजसिंह द्रोणाचार्य से हुई बातचीत के मुख्य अंश।


रविन्द्र शामली-:  गुरू हनुमान जी के 119 वे जन्म दिन पर 15 मार्च 2019 को जो यह आयोजन हुआ है। इसका श्रेय  आाप किसे देगे सर 

श्री राजसिंह द्रोणाचार्य -: इस आयोजन का श्रेय जाता है गुरू हनुमान जी को ।  उनके आशिर्वाद से ही यह सब सम्भव हुआ है। उन्ही की वजह से इतने लोग बहुत दूर दूर से आये है, आपना काम छोडकर आये है। 

रविन्द्र शामली- आज के दौर मे खेल कितना बदल गया सर ?

श्री राजसिंह द्रोणाचार्य -:  बदलाव समय की मागं होती है। खेल मे टैक्निक बहुत आ गई है। पढाई बहुत जरूरी हो गई । इसलिये हमे अपने आप को  समय के साथ बदलना होगा और आगे बढना होगा । खेल के क्षेत्र मे आगे बढने के लिये हम लगातार प्रयासरत है। 

रविन्द्र शामली-: सर इस बार भारत केसरी टाईटल गद्दे पर करवाया गया पहले मिट्टी पर करवाया जाता था बदलाव के पीछे क्या सोच रही ?

श्री राजसिंह द्रोणाचार्य - मै जब भी खेल के विषय पर सोचता हू तो यही सोचता हू कि खेल आगे कैसे बढे,  इस बार यह टाईटल गद्दे पर इसलिये करवाया गया कि इसका सीधा लाभ खिलाडियो को मिल सके क्योकि भविष्य मे जो भी मुकाबले बहार विदेशो मे होगे उनमे हमारे बच्चो को लाभ मिले । 

रविन्द्र शामली-: केन्द्रय मन्त्री श्री हर्षवर्धन जी के सामने आपने आज गुरू हनुमान जी के अखाडे की कई समस्याये उठाई और श्री हर्षवर्धन जी ने भी  बहुत ही सकारात्मक बात की है। आप को क्या लगता है ?

श्री राजसिंह द्रोणाचार्य -: उम्मीद है अच्छा ही होगा मन्त्री जी ने सकारात्मक बाते की है। हम यही चहाते है सुखद नतीजे निकले और समय के साथ -साथ गुरू हनुमान जी का नाम और संस्था और आगे बढे । 

रविन्द्र शामली- सर गुरू जी के नाम पर और कोई योजना आगे बढ रही है ? 

श्री राजसिंह द्रोणाचार्य -: हमने इस बार साल 2019 से गुरू हनुमान जी के नाम पर गुरू हनुमान खेल रत्न अवार्ड देना शुरू किया है। जिसमे गुरू हनुमान जी  के प्रतीक चिन्ह के साथ खिलाडी को एक लाख रूपये दिये जाते है। पहला गुरू हनुमान खेल रत्न अवार्ड  पहलवान सुशील कुमार को दिया है।  आगे कोशिश करेगे की दूसरे खेल के खिलाडियो को भी यह अवार्ड मिले । हरियाणा मे हमे जमीन का एक बडा हिस्सा किसानो की ओर से गुरू हनुमान जी के नाम पर मिल रहा है। जहाँ  पर हमारी योजना यह  है , कि गुरू हनुमान जी के नाम से एक एसा स्टेडियम स्कूल बने जिसमे हर सुविधा हो , हर खेल हो , एक छत के नीचे खिलाडी को सब सुविधा मिले । यदि यह योजना परवान चढी तो हम सायद उस समय तक ना रहे , लेकिन देश को सुखद परिणाम खेल के क्षेत्र मे भविष्य मे ज्यादा बेहतर मिलेगे । 

रविन्द्र शामली-: गुरू हनुमान अखाडा से जुडी कोई ऐसी बात सर जो आज भी आपको याद हो तो बताये ? 

श्री राजसिंह द्रोणाचार्य -: जब गुरू जी के अखाडे से एक से एक बडे पहलवान निकले और पहलवानो ने डंका विदेशो मे अपनी कुस्ती कला का बजाया , तो दूसरे देशो से लोग गुरू जी के अखाडे मे ये देखने के लिये आते थे कि वो कौन सी खान है दिल्ली मे जहॉ से एसे एसे पहलवान निकल कर आ रहे है। विदेशी सोचते थे कि पता नही कौनसी सुविधा है यहॉ पर,  जिसके बल पर परचम लहरा रहे है।  ये भी एक याद है और भी बहुत सारी यादे है बताऊगां फिर कभी । 

रविन्द्र शामली-:  अगली बार जब भी कोई बडा आयोजन गुरू हनुमान जी की संस्था की और से होगा तो क्या बदलाव देखने को मिल सकता है सर ? 

श्री राजसिंह द्रोणाचार्य -:  हो सकता है आपको पुरूषो के साथ साथ महीलाओ की कुस्ती भी देखने को मिले ।

रविन्द्र शामली- खिलाडियो के लिये कोई संदेश ?

श्री राजसिंह द्रोणाचार्य -:  मै तो खिलाडी  बच्चो के लिये यही कहुगा कि यदि आपको खिलाडी बनना है, आगे बढना है तो अनुशासित बनना पडेगा ,  यदि आप अनुशासित नही है। तो आप उतना आगे नही जा सकते जितने के आप हकदार हो 


साक्षातकार कर्ता 
रविन्द्र शामली
कुस्ती जगत 

Thursday, March 14, 2019

गुरू हनुमान पर विशेष


 गुरू हनुमान का असली नाम था विजयपाल 




विजयपाल का जन्म 15 मार्च सन् 1901 मे राजिस्थान के झुंझुनूं जिले की चिडावा तहसील मे एक किसान परीवार मे हुआ था । विजयपाल को बचपन से ही कुस्ती का बेहद शौक था । लेकिन पस्थितियॉ अनुकूल नही थी । फिर भी रोजाना कसरत कारना विजयपाल की दिनचर्या मे शामिल था ।


नौकरी की खोज मे आये थे दिल्ली

 विजयपाल जब कुछ बडे हुये तो दिल्ली आ गये और दिल्ली की बिडला मिल मे नौकरी करने लगे थे। विजयपाल का नौकारी से बचा हुआ समय बिडला व्यायामशाला मे ही बीतने लगा,  इन्ही बातो से प्रभावित होकर के0के0 बिडला ने बिडला मिल की व्यायामशाला विजयपाल को दान मे दी । अब विजयपाल के कदम जमीन पर कहॉ पडने वाले थे , विजयपाल को रात मे भी नीदं ना आती रात के तीन बजते ही बिडला व्यायामशाला के अखाडे पर खडे हो तेल की मालिश करने के बाद विजय पाल दण्ड बैठक पेलने लगते ।



दिल्ली के युवा विजपाल से हो गये थे प्रभावित

विजयपाल से प्रभावित हो आस पास के लडके भी विजय पाल के पास आने लगे विजय पाल की कुस्ती के प्रति दीवानगी को देख के0के0 बिडला समेत कई लोग विजय पाल को  हनुमान कहने लगे थे ।  देखते ही देखते विजयपाल का नाम ही हनुमान पड गया , समय के साथ - साथ अखाडे मे पहलवानो की संख्या बढने लगी थी । विजयपाल को विजयपाल से हनुमान और हनुमान से गुरू हनुमान बनते देर ना लगी । इस बिडला व्यायामशाला की स्थापना तो बहुत पहले हो चुकी थी लेकिन 1920 मे गुरू हनुमान ने इस व्यायामशाला की बागडोर अपने हाथ मे ले ली थी । सन 1928 के बाद गुरू हनुमान का सारा समय पहलवानो को तैयार करने मे बीतने लगा । गुरू हनुमान ने इस अखाडे की मिट्टी मे अनेको योद्धा , राष्ट्रीय , अर्न्तराष्ट्रीय पहलवान तैयार किये ।



गुरू हनुमान जी अनुशासन प्रिय व्यक्ति थे 

गुरू हनुमान जी अनुशासन प्रिय व्यक्ति थे , अनुशासन हीनता उन्हे बिलकुल बरदास्त नही थी । एक बार की बात है। गुरू हनुमान जी को एक जगह जाना था गुरू जी अखाडे से चल दिये सभी पहलवान जानते थे कि गुरू जी कल तक आयेगे  लेकिन रस्ते मे से ही किसी कारण गुरू हनुमान वापिश आ गये अखाडे का एक नामचीन पहलवान फिल्म देखने चला गया था । गुरू जी को जब इस बात का पता चला तो गुरू जी सिनेमा हाल मे पहुच गये । जैसे ही नामचीन पहलवान सिनेमा घर से बहार निकला तो गुरू जी ने कई लठ मार दिये सब देखते रह गये एसे थे गुरू जी हनुमान उन्होंने कभी अनुशासन के मामले मे समझोता नही किया

अनुशासन बना पहलवानो के लिये संजीवनी 

गुरू हनुमान की लाठी और अनुशासन ने पहलवानो को एक एसा  माहोल  तैयार करके दिया , जिसके बलबू ते पर अनेको पहलवानो ने देश का नाम रोशन किया गुरू हनुमान उन महापुरूषो मे से है। जिन्होने  अपनी शादी नही कराई लेकिन असंख्य लोगो को उनके पैरो पर खडा कर उनके  घरो मे सहनाई बजवादी


गुरू हनुमान ने अपनी मेहनत से बनाई थी अपनी पहचान 

आज भी कागजो मे यह अखाडा बिडला व्यायामशाला के नाम से दर्ज है , लेकिन देश विदेशो और लोगो के दिलो मे गुरू हनुमान अखाडा के नाम से इस व्यायामशाला ने जगह बनाई है। यह सब गुरू हनुमान की  अपनी मेहनत का ही परिणाम है।


 गुरू हनुमान ने पहलवानो की नौकरी के लिये सरकार के सामने उठाई थी आवाज 

जब गुरू हनुमान ने देखा की पहलवान आखिर मे आर्थिक तंगी का शिकार हो जाते है तो इस समस्या को दूर करने के लिये गुरू हनुमान जी ने सरकार से सिफारिश भी की और परिणाम स्वरूप अच्छे पहलवानो को सरकारी नौकरीयॉ दी जाने लगी । गुरू हनुमान जी आजीवन कुवॉरे रहे । 24 मई 1999 मे गुरू हनुमान जी गंगा स्नान कर लौट रहे थे दुर्भाग्यवश मेरठ के निकट उनकी गाडी का टायर फट गया और गाडी एक पेड से टकरा गई । इसी हादसे मे गुरू हनुमान जी का स्वर्गवास हो गया। उस दिन कुस्ती का एक बडा अध्याय बन्द हो गया था। इस अखाडे के राज सिंह , ब्रहम प्रकाश , सरदार अजित सिंह , वेद प्रकाश , ओम प्रकाश , राजनारायण , रामधन , सूरज भान , सज्जन सिंह ,रामस्वरूप, ज्ञान प्रकाश जैसे पहलवानो को कभी नही भुलाया जा सकता है। गुरू जी हनुमान के द्वारा तैयार किये गये इन पहलवानो ने दुनिया मे अपना लोहा जो मनवाया है।


 अर्जुन अवार्ड प्राप्त करने वाले गुरू हनुमान के शिष्यो पर एक नजर -

 (1) मुख्त्यार सिहं (1967)
(2) सुदेश कुमार (1971)
(3) प्रेमनाथ (1972)
(4) सतपाल (1974)   
(5) जुगमेन्द्र (1980)
(6) करतार सिंह (1982)
(7) महाबीर सिहं (1985)
(8) सुभाष वर्मा (1987)
(9) राजेश कुमार  (1988
(10) अशोक कुमार (1999)
(11) नरेश कुमार (2000)
(12) रणधीर सिंह (2000)
(13) सुजीत मान (2002)
(14) अनुज चौधरी (2004)
(15) शौकिन्द्र तोमर (2005)
(16) सतबीर दहिया (2009)
(17) राजीव तोमर (2014)
(18) मंजीत छिल्लर (2015)

 पदम  श्री पुरूस्कार प्राप्त करने वाले गुरू हनुमान के शिष्यो पर एक नजर -

(1) स्वयं गुरू हनुमान (1983)
(2) सतपाल (1983)
(3) करतार सिंह (1986)



 गुरू हनुमान को प्राप्त होने वाले अन्य अर्न्तराष्ट्रीय पुरूस्कारो पर एक नजर -

1- डिप्लोमा आफ ऑनर (1980) फ्रासं मे गुरू हनुमान को डिप्लोमा ऑफ आनर से सम्मानित किया गया था।
2- लोर्ड बुद्धा अवार्ड (1981) जापान मे गुरू हनुमान को लोर्ड बुद्धा अवार्ड से सम्मानित किया गया था।
3- कुस्ती खुदा अवार्ड (1981) पाकिस्तान मे गुरू हनुमान को कुस्ती का खुदा अवार्ड से सम्मानित किया गया था।
4-मास्टर डिग्री ब्लैक बैल्ट (1991) जापान मे गुरू हनुमान को मास्टर डिग्री ब्लैक बैल्ट से सम्मानित किया गया था।
5-कुस्ती किगं अवार्ड (1991) अमेरिका मे गुरू हनुमान को कुस्ती किगं अवार्ड से सम्मानित किया गया था ।
6-अमर शहीद उधम सिंह अवार्ड (1991) मे गुरू हनुमान को इग्लैण्ड मे अमर शहीद उधम सिंह अवार्ड से सम्मानित किया गया था ।

                                          गुरू हनुमान  व रामधन पहलवान जी

गुरू हनुमान को राष्ट्र की ओर से मिले मान सम्मानो पर एक नजर ।  

(1) 1960 मे भारत के ग्रह मन्त्री ने गुरू हनुमान को राष्ट्र गुरू नामक सम्मान से सम्मानित किया था।
(2) 1982 मे राजिस्थान सरकार ने गुरू हनुमान को राजिस्थान श्री नामक सम्मान से सम्मानित किया ।
(3) 1989 मे बिहार सरकार ने गुरू हनुमान को भीष्म पितामह नामक सम्मान से सम्मानित किया ।
(4) 1991 मे महाराष्ट्र सरकार ने गुरू हनुमान को छत्रपति साहू जी महाराज नामक अवार्ड से सम्मानित किया ।
(5) 2014 मे राष्ट्रीय खेल प्रोत्साहन पुरूस्कार प्राप्त हुआ जिसे द्रोणाचार्य महासिंहराव जी और बिडला मिल के प्रेजिडेन्ट रिसीव कर लेकर आये थे ।


कोच रामधन थे गुरू हनुमान की खोज

 कौन कितने पानी मे है गुरू हनुमान जल्द ही पहचान लेते थे । रामधन जी की कौचिगं का कहा जाता है कोई तोड नही था । रामधन पहलवान जी ने जीवन के आखिरी दिनो तक गुरू हनुमान के अखाडे मे अपना सहयोग दिया और कभी भी सहयोग देने से पीछे नही हटे ।



श्री महासिंहराव से था अटूट लगाव 

वर्तमान मे गुरू हनुमान अखाडा मे कोचिगं दे रहे द्रोणाचार्य महासिहं राव से गुरू जी हनुमान का अटूट लगाव रहा यही कारण है। की यही कारण है कि द्रोणाचार्य महासिंह राव के जीवन का बडा हिस्सा गुरू हनुमान अखाडा मे योगदान देने मे बीता है। महासिंह राव आज भी गुरू हनुमान के आगे सुबह सायं हाथ जोडना नही भूलते हहते है कि मेरा भगवान तो गुरू हनुमान ही है। जो भी हू उन्ही की दया से हू


नवीन मोर को बचपन मे ही बता दिया था कि बनेगा बडा पहलवान

बात उन दिनो की है जब नवीन छोटा बच्चा हुया करता था डाक्टर ने बुखार मे गलत इजेक्शन गला दिया तो पैर मे कमी आ गई थी बालक नवीन को गुरू हनुमान अखाडे मे इसलिये भेजा गया था कि पैर ठीक हो जाये और स्वास्थ्य बना  रहे । उस समय बालक नवीन को गुरू हनुमान के द्वारा भविष्य का बडा पहलवान बताया गया था । सब मजाक मे हंस दिये बाद मे गुरू हनुमान की बाणी सच साबित हुई


आज भी गुरू हनुमान अखाडे की मिट्टी कों अपने साथ ले जाते है लोग 

आज भी गुरू हनुमान लोगो के दिलो मे जिन्दा है। यहि कारण है कि लो दूर दराज से आकर इस अखाडे की मिट्टी को अपने साथ ले जाते है। कुछ लोगो का मानना है कि इस अखाडे मिट्टी मे आज भी गुरू हनुमान का आशिर्वाद छिपा हुआ है।

                                                     श्री राज सिंह कोच द्रोणाचार्य।

गुरू हनुमान अखाडा की कमेटी  

गुरु हनुमान अखाड़ा संचालक  -  श्री राज सिंह कोच द्रोणाचार्य।
महासचिव सह संचालक          -  श्री दिलबाग बाग्गे पहलवान जी।
कोषाध्यक्ष                               - श्री रमेश मोर पहलवान जी।
डिप्टी कमांडेंट टीम मैनेजर       - श्री चांद राम पहलवान
उपाध्यक्ष                                 - श्री नवीन मोर पहलवान भारत केसरी



कोचिंग स्टाफ 

श्री महा सिंह राव द्रोणाचार्य चीफ कोच (कोचिगं के बेताज बादशाह )
श्री संदीप राठी पहलवान (D.S.P CRPF) कोच
श्री चरणदास पहलवान , अंतरराष्ट्रीय कोच

रविन्द्र शामली
कुस्स्ती जगत 

Saturday, March 9, 2019

पहलवान सुरेन्द्र नाड पर विशेष


पहलवान सुरेन्द्र सिंह नाड देश मे एक बहुत बडा नाम है। पहलवान जी ने बहुत नाम कमाया है। पहलवान जी लम्बे चौडे शरीर के मालिक है। पहलवान जी के पिता का नाम दुलीचंद और माता का नाम श्रीमति इन्द्रावति देवी है। पहलवान जी का जन्म हरियाणा के भिवाणी जिला के गॉव खातीवास मे 03-07-1975 मे हुआ था । बाद मे जब दादरी जिला बना तो पहलवान जी का जन्म स्थान दादरी जिला मे आ गया था । पहलवान सुरेन्द्र नाड बचपन से ही अपने साथ के बच्चो मे अपने डील डोल व ताकत से अलग स्थान रखते थे । 

महन्त वेदनाथ जी की निगाह जब सुरेन्द्र सिंह पर पडी

एक समय की बात है। सुरेन्द्र जी भिवानी मे गये हुये थे वहा पर महन्त वेदनाथ जी की निगाह सुरेन्द्र सिंह पर पडी कहते है कि हीरे की परख जोहरी को ही होती है। महन्त वेदनाथ जी ने पहलवान जी के परिवार से मिलने की इच्छा जाहिर की और सुरेन्द्र नामक लडके को भविष्य का बडा पहलवान बताया सुरेन्द्र जी के परिवार ने महन्त वेदनाथ की बात मान ली महन्त वेदनाथ जी भिवाणी मे अपना अखाडा चलाया करते सुरेन्द्र सिंह महन्त वेदनाथ जी के अखाडे मे आ गया । 
 महन्त वेदनाथ कहा करते की मेरा चेला सुरेन्द्र खरा सोना है

अपनी जबरदस्त मेहनत और लग्न से सुरेन्द्र सिंह ने अपने गुरू महन्त वेदनाथ का दिल जीत लिया अक्षर महन्त वेदनाथ कहा करते की मेरा चेला सुरेन्द्र खरा सोना है, खरा सोना । वास्तव मे सुरेन्द्र सिंह खरा सोना ही साबित हुये । 
                                                      पहलवान जी के पिता  दुलीचंद 
प्रसिद्धि मिलने के बाद भी सुरेन्द्र ने नही बदला था गुरू 

जहॉ आज कल लोग थोडे से लालच और नाम के कारण अपने गुरूओ को बदल लेते है। वही पहलवान जी ने सदा अपने गुरू महन्त वेदनाथ का ही नाम रोशन करते रहे । कोई भी लोभ और लालच पहलवान जी को नही डिगा पाया अब वो समय आ गया जब पहलवान जी 18 साल के हो गये पहलवान जी का फोलादी बदन और मोटी नाड को लोग देखकर सुरेन्द्र को सुरेन्द्र नाड कहा करते धीरे धीरे उनके नाम के सामने नाड शब्द और जुड गया और कुछ ही समय मे पहलवान जी पूरे भारत देश मे सुरेन्द्र नाड के नाम से प्रसिद्ध हो गये । 


                                                                                                           उपलब्धि


-पहलवान जी 2 बार हिन्द केशरी बने ।

- पहलवान जी 2 बार इंटरनेशनल सिलवर मेडलिस्ट बने ।
- पहलवान जी 16 वार नेशनल मे मेडल प्राप्त करने मे सफल हुये ।
- पहलवान जी ने 19 बार आल इण्डिया पुलिस गेमस मे पदक प्राप्त किये ।


                                                                                          सुरेन्द्र न
ही करना चहाते थे शादी 

पहलवान सुरेन्द्र नाड जी का वनज 125 से 130 कीलो हुआ करता था पहलवान जी अपने दम खम की बदोलत 1998 मे इस्पेक्टर बने पहलवान जी की शादी के लिये बहुत सारे रिस्ते आया करते लेकिन पहलवान जी हरबार मना कर देते आखिर पहलवान जी की मॉ श्रीमति इन्द्रवती ने 2003 मे पहलवान जी को शादी के लिये बडी मुशकिल से मनाया । पहलवान जी की 2004 मे एकता देवी के साथ शादी हो गई , लेकिन पहलवान जी का कुस्ती के प्रति जनून कम ना हुआ। पहलवान जी ने 2014 तक अपनी ताकत का लोहा मनवाया पहलवान सुरेन्द्र नाड का गोड्डा टेकणा सबते खतनाक माना जाता था । पहलवान जी जब सिंगल पठ लगाते तो विरोधी को उठाकर सैकिन्डो मे जमीन पर ठोक देते थे । पहलवान जी ने अपने इस दॉव की बदोलत अच्छे अच्छे पट्ठो को अपने कुस्ती कैरियर के दौरान आसमान दिखाया । 

सुरेन्द्र नाड है शाकाहारी

पहलवान सुरेन्द्र नाड जी सदा शाकाहारी रहे आज भी शाकाहारी है। पहलवान जी रोजाना आठ कीलो दुध , आधी कीलो बदाम , पाईया घी , तीन लीटर जूस , चार पलेट सलाद , दो से तीन कीलो फलो का सेवन खेल के दिनो मे उनकी डाईट मे शामिल रहा । महन्त वेदनाथ जी का आशीर्वाद हमेसा पहलवान जी के साथ रहा । लम्बे समय तक पहलवान जी अपने नाम का डंका कुस्ती के क्षेत्र मे बजवाते रहे l पहलवान जी का मानना है कि जो सरकारो ने देश के हर गॉव गॉव जाकर शराब के ठेके खोलने का काम किया है। इससे युवा बर्बाद हुआ है। यदि सरकार इस तर्ज पर देश के हर गॉव गॉव जाकर अखाडे या खेल अकेडमी खोलने का काम करती तो आज हम अमेरिका और चीन को खेलो मे चुनोती दे रहे होते । 


सुरेन्द्र नाड जी का मानना है कि हमारे देश मे प्रतिभाओ की कमी नही 

सुरेन्द्र नाड जी का मानना है कि हमारे देश मे प्रतिभाओ की कमी नही है। कमी है संसाधनो की , कमी है उन प्रतिभाओ को निखारने की पहलवान सुरेन्द्र नाड जी का कहना है कि बहुत सारे प्रतिभlवान खिलाडीयो की प्रतिभl पैसे की कमी मे दम तोड देती है। जिसे पहलवान जी दुर्भांग्य पूर्ण मानते है। 



सुरेन्द्र नाड का युवाओ के लिये संदेश 

दोस्तो परेशानियां सभी के जीवन मे आती है। परेशानियों का सामना करना ही वास्तविक जीवन का आधार है। मेहनत करो फल जरूर मिलेगा बुरे कामो से दूर रहो । बुरे लोगो से भी दूर रहो । नशे के पास मत जाना नही तो नशा आपको र्बबाद करदेगा अपने बडो की सेवा करो सुबह साम परमात्मा को याद किया करो । -----------------
पहलवान जी ने कम संसाधनो और सुख सुविधाओ के बावजूद बडा संघर्ष किया है। कुस्ती जगत मे पहलवान जी सुरेन्द्र सिंह नाड जी जैसी शख्सियतो पर हर भारत वासी गर्व करता है। -


रविन्द्र शामली 
कुस्ती जगत